थैलेसीमिया मेजरसे परेशान मरीजों का जब स्प्लीनक्टॉमी ऑपरेशन किया गया, तो उन्हें काफी हद तक राहत मिली है। खासकर उन मरीजों को जिनकी स्प्लीन (तिल्ली) सामान्य से काफी बढ़ गई थी। उन्हें बार-बार रक्त की कमी का सामना करना पड़ता था। इस ऑपरेशन के बाद इन मरीजों को बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत कम हुई और जीवन की गुणवत्ता बेहतर हुई।अहमदाबाद महानगरपालिका संचालित शहर के एल.जी. अस्पताल में पिछले कुछ महीनों में इस तरह के आठ ऑपरेशन किए गए। ऐसे मरीजों को अस्पताल में लाने की जरूरत तकलीफ बढ़ने के कारण हुई।
थैलेसीमिया मेजरसे परेशान मरीजों का जब स्प्लीनक्टॉमी ऑपरेशन किया गया, तो उन्हें काफी हद तक राहत मिली है। खासकर उन मरीजों को जिनकी स्प्लीन (तिल्ली) सामान्य से काफी बढ़ गई थी। उन्हें बार-बार रक्त की कमी का सामना करना पड़ता था। इस ऑपरेशन के बाद इन मरीजों को बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत कम हुई और जीवन की गुणवत्ता बेहतर हुई।अहमदाबाद महानगरपालिका संचालित शहर के एल.जी. अस्पताल में पिछले कुछ महीनों में इस तरह के आठ ऑपरेशन किए गए। ऐसे मरीजों को अस्पताल में लाने की जरूरत तकलीफ बढ़ने के कारण हुई। इनमें हीमोग्लोबिन की कमी, प्लेटलेट्स की कमी यानी खून पतला होना, पेट भारी होना, पीलिया और हड्डी संबंधी रोग जैसी समस्याएं थीं। जांच के बाद ऑपरेशन का निर्णय लिया गया। अब उन्हें कई तकलीफों से राहत हुई।
थैलेसीमिया मेजरपीड़ित 15 वर्षीय किशोर का कहना है कि पहले काफी समस्याएं होती थीं। बार-बार रक्त की जरूरत होती थी। इसका कारण स्प्लीन सामान्य से तीन से चार गुना बड़ी हो गई। ऑपरेशन के बाद काफी राहत हुई है।
सर्जरी कराने वाले 19 वर्षीय युवक का कहना है कि उनके प्लेटलेट्स बहुत कम थे और हेपेटाइटिस सी से वह पीड़ित थे। ऑपरेशन जोखिम भरा था, लेकिन चिकित्सकों ने जो विश्वास जताया था उसके आधार पर ऑपरेशन किया तो अब काफी राहत है।
तीनथैलेसीमिया पीड़ित दंपत्ति में से पति की स्प्लीन बड़ी होने पर ऑपरेशन करने की नौबत आई। पहले जो समस्याएं थीं अब उनमें से कई से राहत मिली है। हालांकि चिकित्सकों ने बताया कि स्प्लीन नहीं रहने पर संक्रमण का खतरा रहता है, जिसका ध्यान रखते हैं।
मरीजों का ऑपरेशन करने वाले एल.जी. अस्पताल के जनरल सर्जरी विभाग के डॉ. तपन शाह ने बताया कि थैलेसीमिया पीड़ित मरीजों में से कई की स्प्लीन बढ़ जाती है। शरीर में पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। स्प्लीन का काम खराब लाल रक्त कणों को हटाना होता है, लेकिन लगातार अतिरिक्त काम करने से स्प्लीन तीन से चार गुना बढ़ जाती है। इसके चलते मरीजों को पेट में दर्द, भारीपन और बार-बार रक्त की जरूरत होती है। स्प्लीनक्टॉमी से मरीजों को राहत मिलती है, लेकिन इसके बाद संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए ऑपरेशन से पहले और बाद में विशेष टीकाकरण और सावधानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन जोखिम भरा जरूर होता है, लेकिन सही तैयारी और मरीज को विश्वास दिलाने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने इस तरह के आठ मरीजों की स्प्लीन निकालने की सर्जरी की।