#Don’tKillyourself -पत्रिका अभियान को मिली बड़ी सफलता, कलक्टर व शिक्षा राज्यमंत्री ने सिखाए बच्चों को जीने के तरीके

राजस्थान पत्रिका के जिंदगी बड़ी अनमोल..मौके देती हजार अभियान के तहत शुक्रवार को सेमिनार का आयोजन हुआ। जिंदगी में विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी हासिल करने वाले लोग विद्यार्थियों से रूबरू हुए। सेमिनार को शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी, जिला कलक्टर गौरव गोयल, मनो चिकित्सक डॉ.के.के.शर्मा ने संबोधित
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Jun 10, 2017
don't kill your self
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राजस्थान पत्रिका के जिंदगी बड़ी अनमोल..मौके देती हजार अभियान के तहत शुक्रवार को सेमिनार का आयोजन हुआ। जिंदगी में विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी हासिल करने वाले लोग विद्यार्थियों से रूबरू हुए। सेमिनार को शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी, जिला कलक्टर गौरव गोयल, मनो चिकित्सक डॉ.के.के.शर्मा ने संबोधित किया।

सबने केवल एक मंत्र दिया...जिंदगी सिर्फ जिंदगी है। उसका पैमाना 90 या 100 नम्बर तक सिमटा नहीं है। निराशा में डूबना, तनावग्रस्त रहना और जिंदगी को खत्म कर लेना...कोई हल नहीं है। कॅरियर संवारने, आगे बढऩे के हजार मौके हैं। इसके लिए प्रयास करें...कामयाबी खुद आपके कदम चूमेगी।

सेमिनार में विद्यार्थियों को जीवन में आत्मविश्वास और धैर्य रखने, मानसिक अवसाद एवं तनाव से दूर रहने के फायदे और अन्य विषयों की जानकारी दी गई। इसमें बताया गया कि राजस्थान पत्रिका ने इसको लेकर डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रेशर ऑर टेरर...पार्ट-2 फिल्म भी तैयार की है। इसे पत्रिका डॉट कॉम पर देखा जा सकता है।

अभियान के अन्तर्गत बच्चों को निराशा के भाव त्यागने एवं क्षमताओं को पहचान कर लक्ष्य की ओर बढऩे के लिए प्रेरित किया गया। समारोह में राजस्थान पत्रिका के सम्पादकीय प्रभारी उपेंद्र शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया। शाखा प्रभारी मनीष डांगी ने स्वागत किया। खंगारोत चौहान क्लासेज के निदेशक ज्वालाप्रताप सिंह खंगारोत, लॉयन्स क्लब से आभा गांधी, राजेन्द्र गांधी, नैना सिंह, सीमा पाठक, प्रभा गुप्ता सहित कई लोग मौजूद थे। ट्रायम्फ एकेडमी का भी सहयोग रहा।

चींटी से सीखें गिरना और लक्ष्य तक पहुंचनाशिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि केवल स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय की परीक्षा देना, नम्बर हासिल करना ही जिंदगी नहीं है। साल के 365 दिन, महीने और 24 घंटे भी समान नहीं होते। लक्ष्य तक पहुंचना है, तो चींटी से सीखिए। वह मुंह में दाना-खाना लेकर कई बार दीवार पर चढ़ती और फिसलकर नीचे गिरती है, लेकिन अन्तत: सफल होती है। परीक्षाओं से पहले और इसके दौरान विद्यार्थी बेवजह तनाव मुक्त रहते हैं। याद होते हुए भी कॉपी में कुछ लिख नहीं पाते।

मैं खुद इंजीनियरिंग के एक पेपर में खूब पढऩे के बावजूद पास नहीं हुआ। मैंने दोबारा उस पेपर की तैयारी तनाव मुक्त होकर की, और कामयाब रहा। हम नियमित और एकाग्रता से जितना भी पढ़ेंगे वही हमारे लिए स्थाई होगा। 90 या 100 नम्बर नहीं आने, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक नहीं बन पाने पर निराशा की कतई जरूरत नहीं है। जिंदगी में लेखन,, चित्रकार, संगीतकार, शिक्षक, सलाहकार, उद्यमी और किसी भी क्षेत्र में कॅरियर बनाने के कई अवसर मौजूद हैं।फोटो- जिंदगी को जीएं खुलकर कलक्टर गौरव गोयल ने कहा कि जिंदगी सिर्फ जिंदगी है.....विद्यार्थी हो या अफसर सबको इसे खुलकर जीना चाहिए।

अच्छे नम्बर नहीं आना, दोस्त से विवाद, फेल होना, मनचाही नौकरी नहीं मिलना...यह सब दुर्बल मनोभाव हैं। आप एक सेकंड के लिए मुंह और नाक बंद करके देखिए...सांस रुकती महसूस होगी। तब एकदम ख्याल आएगा..जिंदगी बहुत अनमोल है। जिंदगी निरन्तर सीखने का भाव है। क्षणिक आवेश में गलत कदम उठाने के बजाए चुनौतियों को स्वीकारें और निरन्तर प्रयत्न करें, इसमें ही कामयाबी छिपी होती है। हर विद्यार्थी और हर व्यक्ति की क्षमताएं अलग-अलग हैं। मार्कशीट में अच्छे अंक, अच्छी नौकरी, अच्छा पद, शानदार कपड़े, घर, गाड़ी...यही जिंदगी का लक्ष्य नहीं है।

बेशक किसी भी परीक्षा, साक्षात्कार अथवा जिंदगी के अहम फैसले के वक्त तनाव होना स्वाभाविक है। असफलता और तनाव को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए। मस्तिषक में नकारात्मक विचार होते ही व्यक्ति गलती कर बैठता है। जिंदगी भी क्रिकेट की तरह है। हर मैच और हर बॉल पर चौका या छक्का नहीं पड़ता। कभी सौ रन तो कभी जीरो पर भी खिलाड़ी आउट होता है, लेकिन वह निराश होकर खेलना नहीं छोड़ता। जिंदगी भी कुछ ऐसी होती है। नाकामयाबी पर तनावग्रस्त होने, निराश होने के बजाय आंख, नाक, कान खुले रखकर प्रयत्न करने चाहिए। समस्या से खुद जूझने के बजाय करें चर्चाजवाहरलाल नेहरू अस्पताल के मानसिक रोग विभाग के डॉ. के. के. शर्मा ने कहा कि युवाओं और टीनएजर्स में पढ़ाई का बोझ, अच्छे नम्बर नहीं आना, चिड़चिड़ापन, व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण बढ़ रहे हैं। लेकिन यह समय, परिस्थिति और घटना पर निर्भर करता है। विद्यार्थियों को मानसिक, शारीरिक समस्या से खुद जूझने के बजाय मनोचिकित्सक, शिक्षक, परिजनों से सलाह लेनी चाहिए।

इसमें शर्म या झिझक नहीं होनी चाहिए। मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, कम्प्यूटर पर ज्यादा वक्त बिताना सेहत के लिए घातक साबित हो रहा है। विद्यार्थी इनका उपयोग करें पर इसका सही वक्त और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल हो यह ध्यान रखें।

कोई विद्यार्थी आत्महत्या जैसा कदम भी एकदम नहीं उठाता। ऐसा तभी संभव है, जबकि वह तनाव में रहकर उस समस्या से कई बार जूझा हो। किसी से चर्चा, सलाह या उपचार नहीं लेने पर समस्या विकराल हो जाती है। विद्यार्थी को ऐसी समस्याओं पर डरने या झिझकने के बजाय तत्काल परिजनों, चिकित्सक, दोस्त या किसी परामर्शदाता से चर्चा कर उसका निवारण करना चाहिए। केवल डॉक्टर, इंजीनियर, आईआईटी या आईएएस में जाना ही जिंदगी का एकमात्र ध्येय नहीं है। आज कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां कॅरियर बनाने के ढेरों विकल्प हैं।

देवनानी ने कहा तीन 'पीÓ और तीन 'सीÓ पर करें फोकस

परफेक्टनेस (निपुणता), पैशेन्स (धैर्य), पोलाइटनेस (नम्रता)।

कॉन्फिडेंस (आत्म विश्वास), कम्यूनिकेशन (संवाद), क्रिएटीविटी (सीखने की ललक)।

यह टिप्स कारगार....

-समस्या में तनावग्रस्त रहने के बजाय करें योग और व्यायाम।

-किसी आदत में अचानक बदलाव हो तो करें चिकित्सक से संपर्क।

-परिवार, मित्रों, विशेषज्ञों से नियमित संवाद और समस्या पर करें चर्चा।

-किसी एक लक्ष्य या एक ही काम में नाकामयाबी पर नहीं हो निराश।

-स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में नियुक्त हों परामर्शदाता।


Published on:
10 Jun 2017 12:14 pm
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