
लूणी नदी में बनी सड़क की ड्रोन फोटो
Luni River Road Construction: पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली लूणी नदी के बहाव क्षेत्र में सड़क निर्माण का मामला अब गंभीर कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। बालोतरा में छत्रियों का मोर्चा से मेगा हाईवे तक बनाए गए लिंक रोड को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि राजस्व अभिलेखों में ‘गैर मुमकिन नदी’ दर्ज भूमि पर सड़क निर्माण कानून सम्मत नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत शपथ-पत्र तथा विशेषज्ञ तकनीकी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
गौरतलब है कि राजस्थान पत्रिका ने 'लूणी नदी में सड़क निर्माण पर सवाल, बिना सत्यापन शुरू हुआ काम' शीर्षक से खबर प्रकाशित कर प्रशासन को अवगत करवाया था। इसके बाद जिला कलक्टर ने भी राजस्व पैमाइश रिपोर्ट के आधार पर लूणी नदी में निर्माण कार्य स्वीकारा था। वहीं 26 मई 2026 को हुई सुनवाई के बाद 15 जून 2026 को जारी आदेश में न्यायालय ने लूणी नदी के बहाव क्षेत्र में सड़क निर्माण को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।
अदालत ने कहा कि जनहित के नाम पर नदी की प्राकृतिक संरचना और बहाव क्षेत्र से समझौता नहीं किया जा सकता। यदि किसी सार्वजनिक परियोजना को नदी क्षेत्र से होकर गुजरना आवश्यक हो तो पुल, एलिवेटेड कॉरिडोर अथवा खंभों पर आधारित संरचनाओं जैसे इंजीनियरिंग विकल्प अपनाए जाने चाहिए।
एडवोकेट सुमेरलाल शर्मा ने बताया कि प्रदूषण निवारण एवं पर्यावरण संरक्षण समिति की ओर से दायर जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी एवं न्यायमूर्ति डॉ. नूपुर भाटी की खंडपीठ ने सुनवाई की। याचिका में आरोप लगाया गया कि छत्रियों के मोर्चे से मेगा हाईवे तक बनाई जा रही बीटी सड़क को मास्टर प्लान में निर्धारित गैर मुमकिन कटान मार्ग के बजाय सीधे लूणी नदी की तलहटी एवं बहाव क्षेत्र में निर्मित किया गया है।
कोर्ट के समक्ष जिला कलक्टर बालोतरा और तहसीलदार पचपदरा की संयुक्त रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में किए गए सीमांकन और माप के आधार पर यह तथ्य सामने आया कि सड़क का निर्माण नदी क्षेत्र में किया गया, जबकि मास्टर प्लान में उसका स्थान अलग निर्धारित था।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि राजस्थान की अधिकांश नदियां वर्ष के अधिकतर समय सूखी दिखाई देती हैं, लेकिन इससे उनका कानूनी अथवा पारिस्थितिक स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता। सूखी नदी भी नदी ही होती है। यही बहाव क्षेत्र मानसून के दौरान बाढ़ निकासी, भूजल पुनर्भरण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अदालत ने विशेष रूप से लूणी नदी का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख नदी प्रणाली होने के कारण इसके प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम और बहाव क्षेत्र का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि ‘गैर मुमकिन नदी’ दर्ज भूमि केवल खाली सरकारी भूमि नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जिसका संरक्षण राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि सड़क निर्माण संभवतः भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया और वित्तीय व्यय से बचने के उद्देश्य से नदी क्षेत्र में किया गया प्रतीत होता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्यप्रणाली स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने राज्य सरकार को 4 सप्ताह में शपथ-पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ तकनीकी विशेषज्ञों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें सड़क को एलिवेटेड संरचना में परिवर्तित करने अथवा अन्य इंजीनियरिंग समाधान की संभावनाओं का उल्लेख होगा।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि गैर मुमकिन नदी क्षेत्र में निर्माण की अनुमति देने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई के सवाल पर भी विचार किया जाएगा। याचिकाकर्ता पक्ष के अनुसार मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। अब निगाहें राज्य सरकार की रिपोर्ट और न्यायालय के आगामी निर्देशों पर टिकी हैं।
Updated on:
17 Jun 2026 09:49 am
Published on:
17 Jun 2026 09:18 am
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