इस बार भी हिंदी संवत तथा ख्वाजा गरीब नवाज का उर्स साथ साथ आए हैं।
दिलीप शर्मा/अजमेर।
हमारा राष्ट्रीय पंचाग जो शालीवान शक संवत पर आधारित है जो सर्वाधिक विज्ञान सम्मत व विश्वसनीय है। भारत सरकार ने भी शक संवत पंचांग को सरकारी गजट अधिसूचना में भारत सरकार ने लागू किया। सरकार ने गजट अधिसूचना में शक संवत पंचांग को 22 मार्च से अंगीकृत करते हुए लागू किया था। संयोग से इस बार भी हिंदी संवत तथा ख्वाजा गरीब नवाज का उर्स साथ साथ आए हैं।
आजादी के पहले से ही देश के विभिन्न भागों में 30 प्रकार के कैलेंडर या पंचाग समुदायों में प्रचलित थे। उन्हीं से वार त्यौहार, क्रियाकलाप, विवाह मुहूर्त आदि कार्य संपादित कराए जाते थे। भिन्न-भिन्न कैलेंडर होने से तीज-त्योहारों की तिथियां भी प्रभावित होती थी, जिससे सामाजिक व प्रशासनिक गतिविधियों पर असर पड़ता था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इतने सारे कैलेंडर पंचांग को सांस्कृतिक वैभव की निशानी मानते थे लेकिन देश के एकीकरण व राष्ट्र एकता में बाधक भी समझते थे।
वर्ष 1952 में एकीकृत कैलेंडर का अमली जामा पहनाने की शुरूआत हुई। विज्ञान व प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद के तहत कैलेंडर सुधार समिति का गठन किया गया। देश के सुपरिचित खगोल शास्त्री मेघनाथ को समिति का अध्यक्ष चुना गया। समिति ने 1955 में सिफारिशें सरकार को दी।
सरकार ने आजादी के बाद 22 मार्च 1967 को राष्ट्रीय पंचांग कैलेंडर स्वीकार किया जो वैज्ञानिक दृष्टि से भी परिपूर्ण था। आज सरकारी प्रकाशनों, राजपत्र, आकाशवाणी व प्रशासनिक तंत्र में संदेशों का आधार यही कैलेंडर है। पूर्व में प्रचलित शक संवत तथा विक्रमी संवत पर आधारित है।
पुरानी वस्तुओं के संग्रहकर्ता बी. एल. सामरा ने बताया कि एकीकरण पश्चात ही हमारा राष्ट्रीय शक संवत का पंचांग कैलेंडर चैत्र माह से शुरू होता है। और फाल्गुन में समाप्त होता है।
पिछले पचास वर्षों के पंचांग तथा सैकड़ों बधाई पत्रों का संकलन भी सुरक्षित है। सामरा के पास ऐसे कई पुराने पंचांग व पत्र आज भी सुरक्षित रखे हैं।