
अजमेर. प्रदेश के बेरोजगारों के लिए नौकरी दूर की कौड़ी साबित हो गई है। 15 लाख नौकरियों का सपने दिखाने वाले नेताओं को शायद वायदा याद भी नही है। पांच साल पहले चुनावी मौसम में नौजवानों को खूब सब्जबाग दिखाए गए। उनकी उम्मीदों को हवा देकर वोट लिए गए। सत्ता के गलियारे में घुसते ही नेताओं ने तेजी से रंग बदल लिया। जिस राजस्थान लोक सेवा आयोग पर युवा पीढ़ी सबसे यकीन करती थी, उसे ही भर्तियों के लिए सरकार का दरवाजा खटखटाना पड़ गया। अधीनस्थ सेवा बोर्ड को कुछ भर्तियां मिली पर ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुई।
उधर सरकार के मंत्री कसीदे पढऩे में पीछे नहीं है। कई मंत्री तो भर्तियों का चुनावी वायदा पूरा करने का ऐलान कर चुके हैं। कुछ दावा करते हैं कि समय रहते सबकुछ ठीक हो जाएगा। खुद सरकार कहती है, कि हमने सरकारी के साथ प्राइवेट नौकरी देने की बात कही थी। नौजवान ही उलटा समझे तो यह हमारा दोष नहीं है। लेकिन युवाओं का विश्वास अब उठ चुका है। कहीं बेरोजगारों को भैंस के आगे बीन तो कहीं भर्ती रैली में खाकी वर्दी के डंडे खाने पड़ रहे हैं। हालिया उप चुनावों में सरकार को करारा झटका भी लगा। फिर भी कोई आस दिख नहीं रही। हताश, हैरान और परेशान युवाओं ने अब भाजपा मुक्त राजस्थान की कसम खाई है। पांच साल पहले विराट बहुमत से आई सरकार का वोट बैंक खिसक रहा है। यदि ऐसा हुआ तो चंद महीनों बाद खुद भाजपा 'बेरोजगार बन सकती है।
सरकार को यह समझना होगा कि केवल घोषणाओं से कुछ नहीं होता जमीनी स्तर पर ठोस नीति बनाने से ही आगे पार पड़ेगी। नए प्रयोग के साथ यदि सेवा क्षेत्र में विस्तार किया जाता तो युवाओं को रोजगार मिलता और प्रदेश की तरक्की भी होती।