
खण्डार. क्षेत्र स्थित खारी बावड़ी केवल प्राचीन जलस्रोत ही नहीं, बल्कि इतिहास, लोकआस्था और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस बावड़ी का निर्माण लगभग एक हजार वर्ष पूर्व हुआ था। यह निर्माण तारागढ़ दुर्ग के निर्माण से भी पहले का माना जाता है।
बंजारा-जैन व्यापारियों की धरोहर बनी खारी बावड़ी
इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार केशु की बावड़ी, खारी बावड़ी तथा झूमर बावड़ी का निर्माण बंजारा, जैन और लोधी व्यापारियों ने अपने व्यापारिक मार्ग पर यात्रियों के लिए पेयजल और विश्राम की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कराया था। उस समय सवाई माधोपुर से जयपुर जाने का प्रमुख मार्ग इन्हीं बावड़ियों से होकर गुजरता था।
आज भी आस्था और इतिहास की साक्षी
लोकमान्यता है कि खारी बावड़ी की खुदाई के दौरान दो स्वयंभू प्रतिमाएं प्राप्त हुईं। इनमें बड़ी प्रतिमा श्री बालाजी महाराज तथा छोटी प्रतिमा श्री गणेशजी महाराज की थी। गणेशजी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा बावड़ी परिसर में ही कर दी गई, जबकि बालाजी महाराज की प्रतिमा को समीप पक्का चबूतरा बनाकर विधिवत स्थापित किया गया। चूंकि बालाजी की प्रतिमा खारी बावड़ी की खुदाई में मिली थी, इसलिए मंदिर का नाम खारी बावड़ी वाले बालाजी प्रसिद्ध हुआ। वहीं बावड़ी के जल के खारे स्वाद के कारण इसे खारी बावड़ी कहा जाने लगा।
वर्तमान में मंदिर में प्रतिदिन शाम को संगीतमय भजन-कीर्तन आयोजित होता है। प्रत्येक शनिवार 108 संगीतमय हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया जाता है, जबकि प्रत्येक माह के प्रथम मंगलवार को 1108 सुंदरकांड का संगीतमय पाठ श्रद्धापूर्वक संपन्न होता है। वर्तमान में मंदिर की नियमित पूजा-अर्चना पंडित श्री विनायकजी मिश्रा द्वारा की जा रही है। मंदिर परिसर में श्री गणेशजी महाराज और जिंद बाबा भी विराजमान हैं तथा उनकी नियमित सेवा-पूजा होती है।
इतिहास, लोकआस्था और भक्ति का अद्भुत संगम
खारी बावड़ी वाले बालाजी आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन व्यापारिक इतिहास और लोकआस्था का जीवंत प्रतीक बन चुके हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और बालाजी महाराज के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट करते हैं।स्थानीय परंपराओं के अनुसार खारी बावड़ी की खुदाई के दौरान श्री बालाजी महाराज और श्री गणेशजी की स्वयंभू प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई और यह स्थान "खारी बावड़ी वाले बालाजी" के नाम से प्रसिद्ध हो गया।श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने पर संकट दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नियमित हनुमान चालीसा, सुंदरकांड पाठ और संगीतमय भजन-कीर्तन इस मंदिर की प्रमुख धार्मिक परंपराएं हैं। जनश्रुति है कि बालाजी ने स्वयं इस स्थान को अपनी प्रकट स्थली के रूप में चुना। व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण यहां रुकने वाले व्यापारी और यात्री दर्शन कर अपनी यात्रा आगे बढ़ाते थे। इसी कारण समय के साथ यह स्थल व्यापार, आस्था और जनविश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया। I I