अतरौली ही वह विधानसभा है जिसने बाबू जी यानि कल्याण सिंह को राजनीति में फर्स से अर्स तक पहुंचाया।
अलीगढ़। राजस्थान के राज्यपाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुक्यमंत्री कल्याण सिंह का आज 86वां जन्मदिन है। हमेशा की तरह कल्याण सिंह ने अपना जन्मदिन लखनऊ में मनाया। इस दौरान आगरा , एटा और अलीगढ़ सहित ब्रज के सभी जिलों से भारतीय जनता पार्टी के नेता, कार्यकर्ता उन्हें जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे। कल्याण सिंह के जन्मदिन पर हम आपको बता रहे हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें और किस तरह साल 2017 कल्याण के लिए रहा खास।
अतरौली और कल्याण सिंह का रिश्ता
कल्याण सिंह की बात हो और अलीगढ़ की अतरौली विधानसभा का नाम न आए तो बेमानी होगी। दरअसल अतरौली ही वह विधानसभा है जिसने बाबू जी यानि कल्याण सिंह को राजनीति में फर्स से अर्स तक पहुंचाया। अतरौली विधानसभा सीट राजस्थान के राज्यपाल व पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (बाबूजी) का अभेद किला रहा है। कल्याण सिंह को यहां की जनता ने हमेशा सिर आंखों पर बैठाया है। वे 12 बार चुनाव लड़े और 10 बार जीतकर दबदबा बनाया।
जब 27 साल बाद कल्याण का किला ढहा
एटा से सांसद बनने के बाद कल्याण सिंह ने यह सीट खाली कर दी। कल्याण की विरासत संभालने के लिए इस सीट से उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा मैदान में उतरीं। कल्याण की पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा दो बार चुनाव जीतीं। 2012 विधानसभा चुनाव में प्रेमलता सपा के वीरेश यादव से हार गईं। 27 साल बाद सपा ने कल्याण सिंह के किले को ढहाया था।
पहले भी लगा था झटका
कल्याण सिंह 1962 में जनसंघ के टिकट पर अतरौली सीट से चुनाव लड़े, मगर सोशलिस्ट पार्टी के बाबू सिंह यादव से हार गए। बाबू सिंह 1951 व 1957 में लगातार हार के बाद पुन: जनता के सामने आए थे। हार के बाद कल्याण सिंह मायूस जरूर थे, मगर हतोत्साहित नहीं। 1967 में पुन: चुनाव लड़े और कांग्रेस प्रत्याशी अमर सिंह को हराकर पहली बार सदन में पहुंचे। 1969 में पुन: अमर सिंह को हराया। 1974 में बीकेडी के अनवार खान व 1977 में पुन: अमर सिंह को हराया। 1980 में हार का बदला लेने के लिए अनवार खान कांग्रेस के टिकट से उनके सामने उतरे। इस चुनाव में कल्याण सिंह भाजपा के टिकट पर लड़े और हार गए। लगातार चार बार जीत के बाद हार से कल्याण सिंह विचलित नहीं हुए और 1985 में अनवार खान को पुन: हरा दिया।
ढहने लगा किला तो पौत्र को दी बागडोर
इसके बाद तो कल्याण की ऐसी आंधी आईं कि 1989, 1991, 1993 व 1996 में ताल ठोकने वाले अनवार खान को हर बार हार का सामना करना पड़ा। भाजपा से मनमुटाव के बाद राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई और 2002 के चुनाव में चार सीटें हासिल कीं। खुद कल्याण सिंह अतरौली और सोरों सीट से चुनाव लड़े और जीते। ये अतरौली से प्यार ही था कि सोरों सीट छोड़ दी। उन्होंने अतरौली सीट से भाजपा प्रत्याशी डॉ. उमेश कुमारी को भारी मतों से हराया। 2004 में एटा से लोकसभा सांसद चुने जाने पर अतरौली सीट अपनी पुत्रवधु प्रेमलता को उतारा। इस उपचुनाव में प्रेमलता ने सपा प्रत्याशी अशोक यादव को हराया। 2007 में प्रेमलता बसपा के हरीश शर्मा को हराकर फिर जीतीं। 2012 के चुनाव में सपा प्रत्याशी वीरेश यादव ने कल्याण सिंह के मजबूत किले को ढहा दिया। इस चुनाव में उनकी पुत्र प्रेमलता हार गईं। इस हार से कल्याण खेमा बेहद मायूस हुआ। इसको लेकर अब भाजपा ने कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह को पहली बार चुनाव मैदान में उतारा। संदीप सिंह ने 2017 विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की और औज वह उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री हैं।