Allahabad High Court News : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी को भी उसके पेशे से पुकारना अपराध नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे के आधार पर पुकारना अपने आप में Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। जब तक यह साबित न हो जाए कि उस शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के लिए किया गया था।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X ने एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की। आरोपी ने विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश को चुनौती दी थी। उस पर आरोप था कि उसने एक महिला को 'धोबिन' कहकर संबोधित किया था।
मामला उस समय का है जब शिकायतकर्ता महिला, जो कपड़े धोने का काम करती थी, अपने बकाया मजदूरी की मांग करने के लिए आरोपी के पास गई थी। महिला का आरोप था कि मजदूरी मांगने पर आरोपी ने उसे जातिसूचक शब्द कहते हुए 'धोबिन' कहा।
इसके बाद आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। पुलिस ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323 (मारपीट), 504 (जानबूझकर अपमान), 506 (आपराधिक धमकी) और SC/ST एक्ट की धारा 3(1) के तहत मामला दर्ज किया। यह मामला गौतम बुद्ध नगर की विशेष अदालत में पहुंचा, जहां आरोपी के खिलाफ समन जारी किया गया।
आरोपी के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने बड़ी कानूनी गलती करते हुए पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार या खारिज किए बिना ही विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) को शिकायत में बदल दिया। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी ने निष्पक्ष जांच के बाद आरोपों को झूठा और मनगढ़ंत पाया था।
वहीं, सरकारी पक्ष ने तर्क दिया कि जब अदालत प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत में बदलकर शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज कर आरोपी को समन कर चुकी है, तो आरोपी उस आदेश को चुनौती नहीं दे सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत में बदलने के लिए अदालत को पुलिस की अंतिम रिपोर्ट से असहमति होनी चाहिए, हालांकि आदेश में इसे अलग से लिखना अनिवार्य नहीं है। यदि अदालत प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत में बदलती है तो इसका अर्थ है कि उसने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार नहीं की।
अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता खुद कपड़े धोने का काम करती थी और उसी सिलसिले में मजदूरी मांगने आरोपी के पास गई थी। ऐसे में केवल पेशे को दर्शाने वाला शब्द इस्तेमाल करना अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर जाति के आधार पर अपमानित करने के उद्देश्य से किया गया था, तब तक SC/ST एक्ट की धाराएं लागू नहीं होंगी।