शांति, करुणा और बलिदान का प्रतीक ‘गुड फ्राइडे’ आज अलवर शहर सहित जिले भर में श्रद्धा और सादगी के साथ मनाया गया। ईसाई समुदाय के लोगों ने प्रभु ईसा मसीह के बलिदान को याद करते हुए गिरजाघरों में विशेष प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया। शहर के चर्च रोड स्थित ऐतिहासिक सेंट एंड्रयूज चर्च में दोपहर […]
शांति, करुणा और बलिदान का प्रतीक 'गुड फ्राइडे' आज अलवर शहर सहित जिले भर में श्रद्धा और सादगी के साथ मनाया गया। ईसाई समुदाय के लोगों ने प्रभु ईसा मसीह के बलिदान को याद करते हुए गिरजाघरों में विशेष प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया। शहर के चर्च रोड स्थित ऐतिहासिक सेंट एंड्रयूज चर्च में दोपहर 12 बजे से मुख्य प्रार्थना सभा शुरू हुई, जिसमें बड़ी संख्या में मसीही समाज के स्त्री-पुरुष और बच्चों ने भाग लिया।
सेंट एंड्रयूज चर्च में आयोजित इस विशेष सभा में गेस्ट स्पीकर आनंद सहाय मौजूद रहे। उन्होंने प्रभु ईसा मसीह के अंतिम सात शब्दों की व्याख्या की और उनके की ओर से मानवता के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान पर प्रकाश डाला। इस दौरान चर्च परिसर को सादगी और गरिमा के साथ सजाया गया था। प्रार्थना के दौरान माहौल पूरी तरह भक्तिमय और भावनात्मक रहा।
प्रार्थना सभा के दौरान पास्टर ने उपस्थित समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन शोक का नहीं, बल्कि प्रभु ईसा मसीह के उस असीम प्रेम को याद करने का दिन है, जो उन्होंने मानवता के पापों की मुक्ति के लिए सूली पर चढ़कर दिखाया। पास्टर ने सभी से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में ईसा मसीह के संदेशों को आत्मसात करें और हमेशा सत्य व नेकी के रास्ते पर चलें। सभा में विशेष रूप से देश और दुनिया में अमन-चैन कायम रहने तथा सभी की खुशहाली के लिए सामूहिक प्रार्थना की गई।
गुड फ्राइडे के अवसर पर अलवर के अन्य गिरजाघरों में भी सुबह से ही चहल-पहल देखी गई। चर्चों में अंदर और बाहर विशेष सजावट की गई थी। हालांकि यह दिन प्रार्थना का होता है, इसलिए आयोजन में सादगी का विशेष ध्यान रखा गया। समाज के लोगों ने बताया कि गुड फ्राइडे ईस्टर से ठीक पहले आने वाला शुक्रवार होता है, जो ईसा मसीह के प्रेम और क्षमाशीलता की याद दिलाता है।
दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच, जिसे प्रभु ईसा मसीह के सूली पर चढ़ने का समय माना जाता है, चर्चों में विशेष 'क्रॉस की वंदना' की गई। लोगों ने मौन रहकर और गाकर प्रभु को याद किया। मान्यता है कि आज के दिन ही ईसा मसीह ने दुनिया के कल्याण के लिए अपने प्राण त्यागे थे, इसलिए यह दिन ईसाई धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंध किये गए।