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अलवर जिला परिषद के अधिकारी पंचायती राज विभाग के शासन सचिव के आदेश नहीं मानते। शासन सचिव की ओर से पिछले 9 साल में लिपिक भर्ती-2013 के तहत ऐसे कंप्यूटर प्रमाण पत्र लगाकर नौकरी लेने वाले लिपिकों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे, जिनके प्रमाण पत्र विधि मान्य नहीं हैं। सरकार ने समय-समय पर तीन आदेश जारी किए, लेकिन सबको दबा दिया गया।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रोफेसर यशपाल बनाम छत्तीसगढ़ की याचिका पर जारी किया गया था। इस आदेश के बाद 4 अगस्त 2017 को विभाग के शासन सचिव नवीन महाजन ने इसका हवाला देते हुए डीम्ड विश्वविद्यालय, ऑफ कैंपस और निजी विश्वविद्यालय से कंप्यूटर की डिग्री लेने वालों को सेवा से अलग करने के आदेश दिए थे। इसकी पालना एक साल तक नहीं हुई, तो विभाग के अगले शासन सचिव कुंजीलाल मीणा ने 13 जून 2018 को फिर से आदेश जारी कर स्पष्ट किया कि ऐसे लिपिकों के दस्तावेजों की जांच कर इन्हें सेवा से पृथक किया जाए।
इन आदेशों को भी जिला परिषद करीब 7 साल तक दबाकर बैठी रही। पिछले साल विभाग के शासन सचिव जोगाराम ने जुलाई-2025 में फिर से आदेश जारी किया कि ऐसे लिपिकों को अब तक बर्खास्त नहीं करने वाले अधिकारी, कर्मचारियों पर कार्रवाई के प्रस्ताव भेजे जाएं और इन्हें बर्खास्त किया जाए, लेकिन जिला परिषद की ओर से ऐसे किसी लिपिक पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बारे में जिला परिषद के सीईओ सालुखे गौरव रविंद्र का कहना है कि आदेश के बारे में जानकारी की जाएगी, उसके बाद निर्णय लिया जाएगा।
पंचायती राज विभाग जयपुर के एक सूत्र ने बताया कि जिला परिषद अलवर से मिली 655 लिपिकों की सूची में 50 से ज्यादा लिपिक ऐसे विश्वविद्यालय से कंप्यूटर डिग्री लाकर नौकरी में नियुक्त हुए हैं, जो कि विधि मान्य नहीं है। जिला परिषद ने इनमें से किसी को भी अभी तक बर्खास्त नहीं किया। जबकि हाल ही में बीकानेर जिला परिषद ने ऐसे चार लिपिकों को बर्खास्त किया है। सवाल यह है कि अगर बीकानेर में करवाई हो सकती है तोह यहां क्यों नहीं हो सकती ?
Updated on:
03 Apr 2026 11:25 am
Published on:
03 Apr 2026 11:24 am
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