पंचायती राज चुनाव में जिला परिषद सदस्य एवं पंचायत समिति सदस्य चुनाव में मतदान प्रतिशत ज्यादा नहीं बढ़ पाने से प्रमुख पार्टियों के चुनावी रणनीतिकारों की चिंता बढ़ गई है। चुनाव में मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए प्रशासन की ओर से किए गए प्रयास भी ज्यादा सार्थक नहीं हो पाए।
अलवर. पंचायती राज चुनाव में जिला परिषद सदस्य एवं पंचायत समिति सदस्य चुनाव में मतदान प्रतिशत ज्यादा नहीं बढ़ पाने से प्रमुख पार्टियों के चुनावी रणनीतिकारों की चिंता बढ़ गई है। चुनाव में मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए प्रशासन की ओर से किए गए प्रयास भी ज्यादा सार्थक नहीं हो पाए। पंचायती राज चुनाव के दूसरे चरण में छह पंचायत समितियों में औसत मतदान 57.59 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया, यानि आधे से कुछ ही ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। वहीं पहले चरण में पांच पंचायत समितियों में औसत मतदान 66.09 फीसदी ही रहा।
जिला परिषद सदस्य व पंचायत समिति सदस्य के चुनाव के लिए शनिवार को हुए दूसरे चरण में सबसे कम मतदान थानागाजी पंचायत समिति क्षेत्र के मतदान केन्द्रों पर मात्र 52.52 प्रतिशत मतदान ही हुआ। वहंी राजगढ़ पंचायत समिति में भी मतदान प्रतिशत का आंकड़ा 53.75 तक ही पहुंच सका। रैणी में भी 54.08 प्रतिशत ही मतदान दर्ज किया जा सका। हालांकि कठूमर में 61.31 प्रतिशत, लक्ष्मणगढ़ में 62.81 प्रतिशत तथा नव गठित पंचायत समिति गोविंदगढ़ में 62.98 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।
प्रत्याशियों का प्रचार व प्रशासन के प्रयास काम नहीं आया
पंचायती राज चुनाव को लेकर प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशियों के साथ ही अन्य दलों के उम्मीदवारों व निर्दलीयों ने मतदाताओं को रिझाने के लिए खूब प्रयास किए, वहीं प्रशासन ने भी मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने के कार्यक्रम चलाए, लेकिन चुनाव के दोनों चरणों में मतदान प्रतिशत 70 प्रतिशत को पार नहीं कर पाया। यह स्थिति तो तब है जबकि यह ग्रामीण क्षेत्र का पंचायती राज का चुनाव था। पंचायत चुनाव में मतदान प्रतिशत लोकसभा व विधानसभा चुनाव से ज्यादा रहने की संभावना रहती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ, बल्कि गत लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत का आंकड़ा ज्यादा ही रहा।
परिणाम की उम्मीद पर हो सकता है असर
मतदान प्रतिशत अपेक्षित नहीं रह पाने का असर प्रत्याशियों के चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है। इससे जिला प्रमुख एवं पंचायत समितियों में अपने दल के प्रधान बनवाने की रणनीति में जुटे राजनीतिक दलों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। उन्हें कम मतदान प्रतिशत के चलते चुनाव परिणाम पर संभावित असर को देखते हुए अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।