अलवर

रियासत से सियासत तक अलवर रहा देश भर में सुर्खियों में

पूर्व रियासतकाल से लेकर सियासत के वर्तमान दौर तक अलवर सदैव सुर्खियों में रहा। रियासतकाल में अलवर के पूर्व शासक जयसिंह ने ने उलवर को अलवर नाम देकर नई पहचान दी। उन्हें अलवर के आधुनिक स्वरूप के प्रणेता भी माना जाता है।

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Apr 11, 2022
रियासत से सियासत तक अलवर रहा देश भर में सुर्खियों में


अलवर. पूर्व रियासतकाल से लेकर सियासत के वर्तमान दौर तक अलवर सदैव सुर्खियों में रहा। रियासतकाल में अलवर के पूर्व शासक जयसिंह ने ने उलवर को अलवर नाम देकर नई पहचान दी। उन्हें अलवर के आधुनिक स्वरूप के प्रणेता भी माना जाता है।

पूर्व राजा जयसिंह ने अपने शासनकाल में 100 से अधिक कानूनों का निर्माण किया, 1908 में हिंदी को राज्य भाषा बनाना। वहीं 1920 में प्रशासनिक जागृति के लिए ग्राम पंचायतों की स्थापना, न्याय पालिका को कार्यपालिका से पूर्ण पथ्क कर 1928 में राज्य में उच्च न्यायालय की स्थापना की। सिंचाई के लिए जयसमंद, प्रेमसिन्धु, मंगलसर, मानसरोवर, विजय सागर एवं हंस सरोवर सहित 117 बांधों का निर्माण किया गया। राजर्षि कॉलेज की स्थापना की तथा नि:शुल्क शिक्षा और सैनिक शिक्षा की शुरुआत की गई, 1 अक्टूबर 1930 को राजर्षि कॉलेज की स्थापना की गई। आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से युक्त अलेक्जेंडर हॉस्पिटल को स्थापित किया गया। 1920 में राज्य में बाल विवाह, बेमेल विवाह व मृत्यु भोज पर पाबंदी लगाई। 1917 में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को मादक पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगाया। समाज में शांति के लिए 1928 में अलवर कन्वर्जन एक्ट बनाया। इसके तहत धर्म परिवर्तन पर पाबंदी लगाई गई। राज्य में अनाज, घी आदि सभी प्रकार की भोजन सामग्री शुद्ध रूप में मिलने के लिए 1928 में खाद्य पदार्थों के नियम प्रचलित किए। 1911 में वन्य जीव हिंसा को राज्य में प्रतिबंधित किया। 1918 में ‘सरिस्का वैली’ का निर्माण किया गया।

आजादी के आंदोलन का साक्षी रहा अलवर जिला

भारत की आजादी के आंदोलन का अलवर जिला भी साक्षी रहा। अलवर राज्य प्रजामंडल ने स्वतंत्रता आंदोलन की जिले में अलख जगाई। भारत छोड़ो आंदोलन में भी अलवर जिले ने खासी भूमिका निभाई। राज्य में जनजागृति के अग्रदूत पं. हरिनारायण शर्मा ने अपने परिवार का मंदिर हरिजनों के लिए खोल राज्य में तहलका मचा दिया, वहीं राज्य में किसानों का लगान वृद्धि के विरोध में नीमूचाना में किया गया आंदोलन देश भर में सनसनी फैला गया। नीमूचाना में किसानों पर हुआ नरसंहार अंग्रेजों की हुकूमत की नींव हिलाने वाला साबित हुआ। दिल्ली के निकट होने कारण ब्रिटिश भारत में होने वाले आंदोलनों की हवा के झोंकों का अलवर राज्य के वायुमंडल को प्रभावित करना स्वभाविक था।

नागरिक समितियों का गठन कर सदभावना का बनाया वातावरण

वर्ष 1923 में पं. हरिनारायण शर्मा ने अस्पृश्यता निवारण संघ, वाल्मीकि संघ और आदिवासी संघ की स्थापना की। उन्होंने खादी व स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन और उपयोग का प्रचार किया व नागरिक समितियों के माध्यम से सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाया। राज्य के हर स्तर पर हिंदी समितियों का गठन कर राष्ट्र भाषा का प्रचार किया। उस दौरान शर्मा ने उन गतिविधियों को जारी रखा, जो ब्रिटिश भारत में महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की अंग थी। इससे जनता में जागृति आई। तत्कालीन अलवर के शासक पूर्व महाराजा जयसिंह ने भी उनसे प्रभावित होकर राज्य के शासन सुधार और विकास सहित सभी महत्वपूर्ण मामलों में शर्मा का सहयोग लिया।

खादी टोपी व खादी वस्त्र से राज्य में राजनीतिक चेतना जगाई

उस दौरान गांधी टोपी व खादी वस्त्र अंग्रेजीराज के प्रति विद्रोह के प्रतिक बन गए थे। वर्ष 1931 में कुंजबिहारी लाल मोदी ने खादी टोपी व खादी वस्त्र पहन राज्य में राजनीतिक लहर पैदा की। उन्होंने उसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में अलवर में जगह-जगह तिरंगा झंडा फहराने का सफल आयोजन किया।

गांधीजी के हस्तक्षेप से भवानी सहाय शर्मा की हुई रिहाई

अलवर में पैदा हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख नेता भवानीसहाय शर्मा को अप्रेल 1932 में 1818 के बंगाल रेग्यूलेशन के अंतर्गत गिरफ्तार कर अनिश्चितकाल के लिए दिल्ली में जेल में डाल दिया गया। इस घटना से अलवर राज्य की जनता में उत्तेजना फैली। शर्मा को करीब 7 साल जेल में रहने के बाद महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप कर मार्च 1939 में रिहा कराया। पूर्व महाराजा जयसिंह को देश से निर्वासित किया ब्रिटिश सरकार ने 1933 में पूर्व महाराजा जयसिंह को उनकी राष्ट्रीय गतिविधियों के कारण न केवल गद्दी से हटा दिया, बल्कि उन्हें देश से भी निर्वासित कर दिया। 19 मई 1937 को उनका संदिग्ध अवस्था में निधन हो गया। उस दौरान कुछ युवाओं ने अलवर में पुरजन विहार पर तिरंगा फहरा दिया। उसी अलवर में पहली बार आम सभा का आयोजन किया गया, जिसमें ब्रिटिश सरकार के फैसले की कटु आलोचना की गई। राज्य सरकार ने रातों रात छापा मारकर आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इनमें प्रमुख थे हरिनारायण शर्मा, कुंजबिहारी लाल मोदी, पं. सीताराम, अब्दुल शकूर जमाली, डॉ. मुहम्मद अली व लक्ष्मीनारायण सौदागर शामिल हैं। उन्हें राजद्रोह के अपराध में विभिन्न सजाएं हुई।

1938 में हुई प्रजामंडल की स्थापना

पं. हरिनारायण शर्मा और कुंजबिहारीलाल मोदी के प्रयत्नों से वर्ष 1938 में अलवर राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई। राज्य में उसी वर्ष सरकारी स्कूलों में फीस वृद्धि की गई। प्रजामंडल ने इस वृद्धि का विरोध कर आंदोलन छेड़ दिया। इस कारण हरिनारायण शर्मा, लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी, इंद्रसिंह आजाद, नत्थूराम मोदी, राधा स्वरूप आदि कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए। इस आंदोलन में सरकारी स्कूल के अध्यापक भोलानाथ को राजद्रोह की प्रवृतियों के कारण राज्य सेवा से पृथक कर दिया गया। बाद में वे प्रजामंडल में शामिल हो गए। उस दौरान पुलिस ने प्रजामंडल के अलवर कार्यालय पर कब्जा कर ताला लगा दिया। प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने कार्यालय पर पुन: कब्जा कर वहां तिरंगा फहरा दिया। सरकार ने कार्यकर्ताओं पर मुकदमा चलाया, जिसमें मास्टर भोलानाथ व द्वारिकादास गुप्ता को सजा हुई।

जबरदस्ती चंदा वसूली का विरोध किया

प्रजामंडल ने 1940 में राज्य की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध के लिए अलवर की जनता से जबरदस्ती चंदा वसूली का विरोध किया। पं. हरिनारायण शर्मा व मास्टर भोलानाथ को भारत रक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जब राज्य ने किया प्रजामंडल का दमन वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अलवर राज्य प्रजामंडल को फरवरी 1947 में पहली बार राज्य के दमन का शिकर होना पड़ा। प्रजामंडल ने खेड़ा मंगलसिंह में जागीरदारों के अत्याचारों के खिलाफ सम्मेलन किया। सम्मेलन में शामिल कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसका जनता ने प्रबल विरोध किया।

प्रजामंडल ने बताया आजादी का मतलब

आजादी की अलख प्रजामंडल ने जगाई और इस जोत को देश की स्वतंत्रता मिलने तक अनवरत गतिमान बनाए रखा। इस दौर में आंदोलन की अगुवाई कर रहे कुछ नेताओं को जेल तक की यात्रा कर यातनाएं सहनी पड़ी तो, कई दिन-रात गांव-गांव घूम लोगों में आजादी की अलख जगाते रहे। यही कारण है कि जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र आता है।

स्वतंत्रता संग्राम में राजपुताना का रहा योगदान

स्वतंत्रता संग्राम में राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) का बड़ा योगदान रहा है। सन् 1857 से आजादी प्राप्त होने 1947 तक चले आजादी के लंबे संघर्ष में अलवर जिले के कई वीर सपूतों ने पराक्रम दिखाते हुए जान की बाजी लगाई।

ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सन् 1857 की क्रांति में भी अलवर के वीर सपूतों ने भागीदारी निभाई। इनमें अलवर के सूबेदार चिम्मनसिंह भाटी ने नसीराबाद छावनी के विद्रोह में एक अंग्रेज को मार गिराया। वहीं स्वतंत्रता सेनानी पं. लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी के चचेरे दादा कर्ण त्रिपाठी ने मेरठ छावनी सशस्त्र विद्रोह में भूमिका निभाई। इनके अलावा भी कई अन्य वीर सपूतों ने इस दौर में अंग्रेजों से लोहा लिया, लेकिन अलवर जिले में आजादी की असल अलख प्रजामंडल के गठन के बाद जगी।

भारत छोड़ो आंदोलन का रहा प्रजामंडल पर असर

महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को कांग्रेेस की मुम्बई बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया। उसी दिन एक अन्य बैठक में महात्मा गांधी ने देशी राज्यों के प्रजामंडलों के नेताओं को अपने-अपने शासकों को पत्र लिखकर ब्रिटिश सार्वभौमिकता से संबंध तोडऩे की मांग करने का सुझाव दिया। इसी सुझाव पर अलवर में प्रजामंडल की ओर से कार्य योजना तैयार की गई। कांग्रेस व प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने गुप्त रूप से पटरियों पर बैठक कर आंदोलन को सक्रिय सहयोग देने का निर्णय किया। बाद में महात्मा गांधी ने सन् 1943 में पूना के आगाखां महल में 21 दिनों की भूख हड़ताल की घोषणा की। इसका बाबू शोभाराम पर जादुई प्रभाव पड़ा और वे आठ दिन बाद ही भूख हड़ताल पर बैठ गए। उनकी भूख हड़ताल 13 दिन चली और महात्मा गांधी की हड़ताल के साथ ही टूटी। इस घटना से शोभाराम सर्वप्रिय नेता के रूप में उभरे।

यह रहा प्रजामंडल का स्वाधीनता संग्राम का सफर

प्रजामंडल के विस्तार के लिए बाबू शोभाराम ने गांव-गांव साथियों के साथ दौरा कर सभाएं की। प्रजामंडल के सदस्य सामंतशाही के नुमाईंदे व पुलिस की ओर से अन्याय वाले स्थानों पर पहुंचते। इस दौर में प्रजामंडल के नेतृत्व में राजनीतिक गतिविधियों को सिलसिला शुरू हुआ। वर्ष 1943 से जिले में आंदोलन जोर पकडऩे लगा। शोभाराम के साथ मास्टर भोलानाथ, लाला काशीराम, फूलचंद गोठडिय़ा एवं अन्य कार्यकर्ता भी अलख जगाने में जुटे थे। उन्हीं दिनों रामजीलाल अग्रवाल भी कानपुर, इंदौर आदि स्थानों पर छात्र व मजदूर आंदोलनों का अनुभव लेकर लौटे प्रजामंडल के सहयोग में जुट गए। वर्ष 1944 में गिरधर आश्रम में राजस्थान व मध्य भारत की रियासतों के प्रजामंडल कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हुआ। इनमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण, गोकुल भाई भट्ट जैसे बड़े नेता आए। अब जब भी कहीं प्रजा पर जुल्म हुआ, विरोध का स्वर मुखर हुए। प्रजामंडल ने जागीर माफी जुल्म, कस्टम टैक्स, तंबाकू पर टैक्स, उत्पादन पर बढ़े कर, वारफण्ड की जबरन वसूली, पुलिस व राजस्व अधिकारियों की ज्यादती के विरोध में आंदोलन किए। इस कार्य में कृपादयाल माथुर, रामचंद्र उपाध्याय व अन्य कार्यकर्ताओं को साथ मिला। इस आंदोलन में पं. हरिनारायण शर्मा, लक्ष्मीनारायण खंडेलवाल व अन्य लोग थानागाजी पहुंचे और सभा की।

तब रात को सोते हुए किया गिरफ्तार

खेड़ा मंगलसिंह में जलसा नहीं होने देने पर एक फरवरी 1946 की रात को शोभाराम, रामजीलाल अग्रवाल, लाला काशीराम व भवानीसहाय शर्मा को सोते हुए पुलिस ने वारंट के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के बाद भी गांव में सभा हुई। इसके अलावा भी प्रजामंडल की ओर से अलवर जिले में नव जनजागरण के कार्य किए गए।

कांग्रेस का 1940 में हुआ प्रजामंडल में विलय

अलवर जिले में कांग्रेस की स्थापना सितम्बर 1937 में मन्नी का बड़ स्थित महादेव मंदिर में हुई थी। वर्ष 1938 में राज्य में पहली बार सरकार ने छात्रों पर चार आना मासिक फीस लगाने की घोषणा की। कांग्रेस ने सरकार की इस घोषणा का विरोध कर गिरफ्तारियां दी। बाद में वर्ष 1939 ई. में मोदी नत्थूराम के घर प्रजामंडल की स्थापना हुई। कुछ समय तक कांग्रेस और प्रजामंडल नाम से दो अलग-अलग संस्थाएं चलती रही, बाद में कांग्रेस के उच्च नेताओं के परामर्श पर अगस्त 1940 ई. में कांग्रेस को प्रजामंडल में विलीन कर दिया गया। इसी वर्ष संस्था विधिवत पंजीकृत भी हो गई।

बापू का अलवर से रहा खास नाता

महात्मा गांधी (बापू) का अलवर से खास नाता रहा है। तभी तो नीमूचाना में नरसंहार हो या अन्य घटनाएं, गांधीजी उन पर तीखी प्रतिक्रिया देने में पीछे नहीं रहे। हालांकि अलवरवासियों का गांधीजी को अलवर बुलाने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन 15 मार्च 1939 का दिन अलवर के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए यादगार दिन बना, जब उन्हें अलवर रेलवे स्टेशन पर बापू के चरणों में पुष्पमालाएं अर्पित करने का मौका मिला। आजादी के आंदोलन के दौरान अलवर के अनेक स्वतन्त्रता सेनानी, जन नेताओं का राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से जुड़ाव, मुलाकत व पत्र व्यवहार रहा।

गांधीजी के निजी सचिव आए खादी भण्डार स्थापना करने

वर्ष 1941 में अलवर खादी भण्ड़ार की स्थापना के लिए महात्मा गांधी को स्वतन्त्रता सेनानी नत्थूराम मोदी ने आमंत्रित किया, लेकिन व्यस्तता के कारण वे नहीं आ सके। हालांकि उनके निजी सचिव महादेव भाई खादी भण्ड़ार की स्थापना करने के लिए अलवर आए।

मत्सय संघ के पहले प्रधानमंत्री बने शोभाराम

अलवर भारत की आजादी के समय राजपूताना में 19 सलामी 3 गैर सलामी रियासतें थी। अलवर, धौलपुर, भरतपुर एवं करौली रियासतों व नीमराणा ठिकाने को मिलाकर 18 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ का गठन हुआ था। जिसकी राजधानी अलवर तथा धौलपुर महाराजा उदयभान सिंह इसके राजप्रमुख बने। अलवर के स्वतंत्रता सैनानी शोभाराम कुमावत मत्स्य संघ के पहले प्रधानमंत्री बनाए गए। बाद में मत्स्य संघ का राजस्थान में विलय हो गया।

आपातकाल में अलवर जिले में 46 लोग हुए गिरफ्तार

आपातकाल के दौरान अलवर जिले में 46 लोगों ने मीसा व डीआरआई में गिरफ्तारी दी थी। अलवर की राजनीति के जानकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल बताते हैं कि आपातकाल के दौरान 26 जून 1975 को भूदेव शर्मा, एडवोकेट रामजीलाल गुप्ता के साथ उन्होंने कचहरी में इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए। बाद में भूदेव शर्मा 15 दिन एवं रामजीलाल गुप्ता एक महीने बाद गिरफ्तार हुए। पूर्व विधायक जीतमल जैन सहित अनेक नेताओं की गिरफ्तारी हुई। गोयल के अनुसार वे कचहरी परिसर से ही फरार हो गए। उस दौरान 30 अप्रेल 1975 को खेरली गंज से पथीना जाते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

आपातकाल के बाद बदला अलवर की राजनीति का स्वरूप

आपातकाल के बाद अलवर जिले में राजनीति का स्वरूप बदल गया। आपातकाल के पहले जिले की राजनीति में कांगेस का दबदबा रहा। वहीं आपातकाल के बाद जिले की राजनीति दो धुरीय हो गई। आपातकाल के बाद जनता पाटी, जनता दल और बाद में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। इन दिनों अलवर जिले में ज्यादातर दो दलीय राजनीति प्रभावी रही है। इनमें कांग्रेस व भाजपा प्रमुख है। इसके अलावा चुनावों में बसपा व अन्य दल सहित निर्दलीय भी भूमिका निभाते रहे हैं।

Published on:
11 Apr 2022 11:53 pm
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