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Alwar Nagar Nigam Election: अलवर में मेयर पद की रेस में 5 बड़े चेहरे, BJP-कांग्रेस की है ये तैयारी  

अलवर नगर निगम के नतीजे आते ही मेयर की कुर्सी पर कब्जे के लिए भाजपा और कांग्रेस में रस्साकशी शुरू हो गई है। पार्षदों की बाड़ेबंदी और निर्दलीयों को रिझाने के बीच दोनों दल सामाजिक समीकरण साधने में जुटे हैं। कुर्सी की इस दौड़ में पुराने और नए चेहरों के बीच मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
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Sep 15, 2026
alwar municipal corporation mayor
अलवर नगर निगम (फोटो - पत्रिका)

Alwar Nagar Nigam Mayor Election: अलवर नगर निगम चुनाव के परिणाम आते ही मेयर की कुर्सी को लेकर भाजपा और कांग्रेस में सियासी हलचल तेज हो गई है। दोनों दलों में मेयर पद के लिए दावेदारों के नाम सामने आने लगे हैं। वहीं, पार्षदों की बाड़ेबंदी और निर्दलीयों को साधने की कवायद के बीच अब पूरा राजनीतिक खेल जातीय समीकरण और बहुमत जुटाने पर केंद्रित हो गया है। दोनों ही दल ऐसे चेहरे को आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं, जिसका प्रभाव भविष्य के चुनावों में भी राजनीतिक लाभ दिला सके।

इन नामों की चर्चा

सुमनलता अग्रवाल

क्यों मजबूत? : सुमनलता के पति अजय अग्रवाल अलवर नगर परिषद (वर्तमान में नगर निगम) के सभापति रहे हैं। साथ ही, वे अलवर शहर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं।
किसका समर्थन? : कुछ लोग ऐसा दावा करते हैं कि अजय अग्रवाल को भाजपा के बड़े नेताओं का समर्थन है। उन्हीं के कहने पर अजय ने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा।
क्या अड़चन? : पूर्व में कांग्रेस में शामिल रहे हैं। कांग्रेस के टिकट पर ही विधानसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे।

बीना गुर्जर

क्यों मजबूत? : निवर्तमान मेयर घनश्याम गुर्जर की पुत्रवधू हैं। घनश्याम गुर्जर की अपने वार्ड पर मजबूत पकड़ है।
किसका समर्थन? : घनश्याम गुर्जर केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव व वन राज्यमंत्री संजय शर्मा के करीबी हैं।
क्या अड़चन? : जातीय समीकरण बाधा बन सकता है।

सुनीता यादव

क्यों मजबूत? : इनके पति सतीश यादव भाजपा के मंडल अध्यक्ष हैं। वे दो बार पार्षद रहे हैं। यादव समाज से छह पार्षद चुनकर आए हैं।
किसका समर्थन? सतीश यादव वन राज्यमंत्री संजय शर्मा के नजदीकी माने जाते हैं।
क्या अड़चन? : ओबीसी वर्ग से आती हैं और सीट अनारक्षित महिला है। ऐसे में सामान्य वर्ग अपना हक रखेगा।

कमलेश शर्मा

क्यों मजबूत: इनके पति योगेश मिश्रा आठ साल तक कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे। ब्राह्मण चेहरा और कांग्रेस संगठन में ऊपर तक मजबूत पकड़।
किसका समर्थन: पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के नजदीकी माने जाते हैं।
क्या अड़चन: हर वर्ग को साथ लेकर नहीं चल सके। जिलाध्यक्ष रहते कई निर्णयों को लेकर विवादित रहे।

अपूर्वा शर्मा

क्यों मजबूत : इनके ससुर नीलेश खंडेलवाल शहर विधानसभा से प्रत्याशी रहे हैं। जातीय समीकरण में फिट बैठती हैं। खुद ब्राह्मण समाज से हैं और वैश्य समाज में ससुराल है।
किसका समर्थन : नीलेश खंडेलवाल भाजपा नेताओं के करीबी माने जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े हैं।
क्या अड़चन : भाजपा में पहली बार सक्रियता दिखी। पूर्व में अलग-अलग पार्टियों में रहे हैं।

जातीय समीकरण पर भी दोनों दलों की नजर

भाजपा विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर मेयर पद पर प्रत्याशी उतारने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी की कोशिश ऐसे चेहरे को आगे बढ़ाने की है, जिसका प्रभाव भविष्य के चुनावों में भी राजनीतिक लाभ दिला सके। शहर में ब्राह्मण, वैश्य, माली और पंजाबी समाज के मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। अनुसूचित जाति के मतदाता भी चुनावी गणित में अहम भूमिका रखते हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती है कि वह किस सामाजिक समीकरण वाले चेहरे पर दांव लगाएगी या किसी नए नाम को सामने लाएगी। कांग्रेस भी अपने जातिगत गणित के आधार पर मेयर पद का चेहरा तय करेगी।

निर्दलीयों पर नजर, बहुमत का दावा

भाजपा ने अपने 27 और कांग्रेस ने 23 पार्षदों की अलग-अलग जगहों पर बाड़ेबंदी की है। भाजपा के पार्षद ऋषिकेश में ठहरे हुए हैं, जबकि मतगणना के बाद उन्हें सिक्किम ले जाने की चर्चा है। कांग्रेस बस्सी में ठहरे पार्षदों को पुष्कर या किसी अन्य स्थान पर भेजने की तैयारी में है। भाजपा का दावा है कि उसके साथ 10 से अधिक निर्दलीय आ चुके हैं। कांग्रेस भी बहुमत के लिए पर्याप्त आंकड़ा होने का दावा कर रही है। अब परिणाम के बाद दोनों दलों की असली परीक्षा निर्दलीयों को अपने साथ बनाए रखने और मेयर चुनाव तक पार्षदों की एकजुटता कायम रखने की होगी।