
रक्षाबंधन और पतंगबाजी का अलवर से वर्षों पुराना नाता है। कभी रक्षाबंधन के दिन अलवर का आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता था। इस परंपरा से अलवर के तत्कालीन महाराजा जयसिंह भी जुड़े रहे। वे केवल रक्षाबंधन पर ही नहीं, बल्कि जब भी मौसम खुशनुमा होता और मन करता, वे बाला किला स्थित हवाई बुर्ज पर पहुंचकर पतंगबाजी का आनंद लेते थे।
अलवर के पूर्व राजपरिवार के निजी सचिव रह चुके ठाकुर नरेंद्र सिंह ने बताया कि महाराजा जयसिंह की पतंगबाजी का अंदाज अनूठा था। वे पतंग में उस समय प्रचलित कई नोट लगाकर उसे उड़ाते थे। जब पतंग शहर के बीचों-बीच पहुंच जाती, तो वे उसकी डोर काट देते थे। इसके बाद शहर में पतंग लूटने की होड़ मच जाती थी। एक पतंग मिलने के बाद लोग अगली पतंग कटने का इंतजार करने लगते थे।
नरेंद्र सिंह बताते हैं कि बाला किला क्षेत्र में पहले महल बना हुआ था। यहां महाराजा जयसिंह महत्वपूर्ण बैठकें किया करते थे। इसके अलावा वे कभी-कभी शांत वातावरण में समय बिताने और मन बहलाने के लिए भी यहां पहुंचते थे। इसी दौरान वे पतंग उड़ाकर अपना मन प्रसन्न करते थे। उनके लिए पतंगबाजी केवल रक्षाबंधन तक सीमित नहीं थी।
पुराने समय में अलवर शहर की चीतावन की गली पतंग बनाने के लिए भी जानी जाती थी। वर्तमान में इसी क्षेत्र में डाइट कार्यालय संचालित होता है। यहां रहने वाले मुस्लिम परिवार पतंग बनाने के काम से जुड़े थे। वे पतंग बनाने के साथ-साथ पतंग उड़ाने के भी शौकीन थे। यहां तैयार होने वाली पतंगें अलवर जिले के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचती थीं।
उस दौर में पांच से दस लोगों के समूह खुले मैदानों में पतंगबाजी करते थे। मुंशी बाग, महल चौक और पुराना कटला थाना हाउस के सामने का मैदान पतंगबाजी के प्रमुख ठिकाने हुआ करते थे। रक्षाबंधन के दिन सुबह से शाम तक आसमान में पतंगों का रंगीन नजारा देखने को मिलता था।
पतंगबाजी की यह परंपरा वर्षों पुरानी है। पुराने शहर के क्षेत्रों में कुछ साल पहले तक रक्षाबंधन पर पतंगबाजी का विशेष उत्साह देखने को मिलता था। पुराना कटला क्षेत्र नवयुवक मंडल की ओर से राखी पर पतंगबाजी प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती थी। आज भी यहां पुराने पतंगबाज इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।