अलवर. इन दिनों स्कूलों में ग्रीष्मावकाश चल रहा है, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को अध्ययन के लिए आना पड़ रहा है। इस पर अभी तक सरकार की नजर नहीं पड़ी है। खास बात यह है कि जिन जगहों पर यह केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, वहां न पानी की व्यवस्था है और न […]
अलवर. इन दिनों स्कूलों में ग्रीष्मावकाश चल रहा है, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को अध्ययन के लिए आना पड़ रहा है। इस पर अभी तक सरकार की नजर नहीं पड़ी है। खास बात यह है कि जिन जगहों पर यह केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, वहां न पानी की व्यवस्था है और न बिजली। ऐसे में बच्चों को गर्मी से दो-चार होना पड़ रहा है। महिला एवं बाल विकाल विभाग के अधीनस्थ संचालित 63 हजार आंगनबाड़ीकेन्द्रों पर 2 लाख से ज्यादा बच्चे है, जिनकी उम्र 3 से 6 वर्ष है। इन सभी को आंगनबाड़ी केंद्रों पर बुलाया जा रहा है।
750 रुपए किराया, कैसे मिलेगा बिजली व पानी :
आंनगबाड़ी सहायिकाओं को हर महीने कमरे के किराए के लिए महज 750 रुपए की राशि मिलती है। इतने कम किराए में कमरा और बिजली-पानी खर्च उठाना मुश्किल है। यही वजह है कि छोटे-छोटे कमरों में इन बच्चों को बैठाकर पोषाहार और अध्ययन कराया जा रहा है।
विभाग का तर्क 300 दिन पोषाहार देना जरुरी
विभागका कहना है कि आंगनबाडी के बच्चों को वर्ष में 300 दिन पोषाहार देना आवश्यक है, इसलिए बच्चों को बुलाया जाता है। जरूरत होती है तो टाइम कम कर दिया जाता है। फिलहाल सुबह 8 से 11 बजे तक का समय है। परिजनों का कहना है कि छोटे बच्चों को इतनी जल्दी भेजना मुश्किल होता है। यदि ग्रीष्मकालीन अवकाश मिले तो बच्चे ननिहाल भी जा सकते हैं।परिजनों का तर्क हैं कि कोराना काल व राजकीय अवकाशों में भी लाभार्थियों को टीएचआर के तहत उनके घर पर राशन उपलब्ध कराया जाता रहा है। ग्रीष्मकाल में भी यह सुविधा दी जा सकती है।
कोरोना में दिया तो ग्रीष्मकाल में भी दे पोषाहार
आंगनबाड़ी केंद्रों पर ग्रीष्मकालीन अवकाश की संगठन ने मांग की है। इस संबंध में सीएम को पत्र भी लिखा गया है। छोटे बच्चों को तेज गर्मी में इन केंद्रों पर आना पड़ रहा है। सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा। जब कोरोना में घर बैठे पोषाहार दिया है तो ग्रीष्मकाल में भी दे सकते हैं।
-छोटेलाल बुनकर, अखिल राजस्थान महिला एवं बाल विकास संयुक्त कर्मचारी संघ, जयपुर