
जिले में संचालित प्राथमिक स्कूल से लेकर उच्च माध्यमिक स्कूलों में स्वच्छता के लिए जारी बजट ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। आवश्यकता अधिक रकम की है और मिल कम रही है। सरकार की ओर से संचालित स्वच्छता अभियान का दम निकल रहा है। स्कूलों में बने शौचालयों की रोज सफाई भी नहीं हो पा रही है। क्योंकि स्कूल प्रशासन के पास बजट और सफाईकर्मियों का टोटा है। बताया जाता है स्कूलों को साफ-सुथरा रखने के लिए संस्थान प्रधान अपने स्तर पर व्यवस्थाएं कर रहे हैं। वहीं, स्कूलों को साफ-सुथरा करने के लिए स्कूली विद्यार्थियों का भी सहारा लिया जा रहा है।
इस प्रकार से आता है सफाई के लिए बजट
सरकारी स्कूलों में सफाई के लिए बजट स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से दिया जाता है। इसमें साफ-सफाई के लिए वार्षिक बजट कंपोजिट ग्रांट का 10 फीसदी होता है। इसमें प्राथमिक स्कूलों के लिए एक हजार व उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए 5 हजार होता है। इस राशि में से 3 हजार रुपए सफाई सामग्री के लिए होते हैं और 2 हजार में सालभर की सफाई होती है। बताया जाता है कि दो हजार में शौचालयों की सफाई कैसे संभव है। शिक्षा विभाग को साफ-सफाई का बजट बढ़ाना चाहिए ताकि सरकारी स्कूलों की दशा में सुधार हो सके।
जिले में सरकारी स्कूलों की संख्या 2782 हैं। इसमें साफ-सफाई करने वाले कर्मचारियों का टोटा है। पूरे जिले के सरकारी स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी के 1352 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इसमें से 298 पदों पर ही कर्मचारी तैनात हैं, बाकी 1054 पद रिक्त चल रहे हैं। अगर विभाग की ओर से इन पदों पर नियुक्ति कर दी जाए तो सरकारी स्कूलों की दशा में सुधार हो सकेगा।
साफ-सफाई के लिए कम होता है बजटसरकारी स्कूलों में बने शौचालयों की सफाई आदि के लिए दो हजार रुपए की राशि होती है, जो कम है। ये विभाग की ओर से निर्धारित की जा रही है। सफाई का बजट कम होने पर स्कूल कोष की राशि का उपयोग करना पड़ता है।
रामेश्वर दयाल मीणा, मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी, अलवर।