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Hans Sarovar: हंस सरोवर के डूब क्षेत्र में बन रहा EV चार्जिंग स्टेशन, मुख्य सचिव तक पहुंचा विवाद

अलवर के ऐतिहासिक हंस सरोवर के डूब क्षेत्र में 50 इलेक्ट्रिक बसों के लिए चार्जिंग स्टेशन बनाने का विवाद अब राज्य सरकार के पास पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस निर्माण को बड़ी प्रशासनिक चूक बताते हुए मुख्य सचिव को पत्र लिखा है और जनहित में काम रोकने की मांग की है।
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ev charging station

फोटो पत्रिका - हंस सरोवर में भरा पानी और निर्माणाधीन चार्जिंग स्टेशन (इनसेट में)

हंस सरोवर के डूब एरिया में 50 ईवी बसों का चार्जिंग स्टेशन बनाने का मामला सरकार के पास पहुंच गया है। मुख्य सचिव को कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पत्र भेजे हैं। कहा है कि सरोवर के डूब एरिया में चार्जिंग स्टेशन बनाना बड़ी चूक है, जो अलवर के भविष्य को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में ईवी चार्जिंग स्टेशन का काम रोकते हुए इसे दूसरी जगह बनाया जाए। सामाजिक कार्यकर्ता चर्चित कौशिक समेत कई लोगों ने कई महत्वपूर्ण तथ्य सरकार को उपलब्ध कराए हैं, जिसमें प्रशासनिक स्तर से लेकर यूआइटी की चूक उजागर हुई है।

कार्यदायी संस्था को दिया था नोटिस, सब दबा दिए

जल संसाधन खंड ने एक जुलाई, 2025 को ईवी चार्जिंग स्टेशन बना रही एजेंसी के प्रोजेक्ट मैनेजर को नोटिस दिया था। कहा था कि यह एरिया हंस सरोवर का डूब क्षेत्र है। ऐसे में कार्य रोक दिया जाए। लेकिन नोटिस पर ध्यान नहीं दिया गया और काम तेज कर दिया गया। रूडसिको के इंजीनियर का कहना है कि उनके पास कोई नोटिस नहीं आया। माना जा रहा है कि दिल्ली की मुख्य एजेंसी को नोटिस दिया गया हो।

यूआइटी ने आवासीय योजना के लिए सर्वे कराया, इस जमीन का नहीं

अलवर यूआइटी ने ढांढोली, बहाला की 31 हेक्टेयर जमीन पर आवासीय योजना लॉन्च करने के लिए जल संसाधन खंड से सर्वे कराया। रिपोर्ट यूआइटी को सौंप दी गई। इसके बाद यूआइटी ने आवासीय योजना लॉन्च करने के लिए कदम नहीं उठाया, लेकिन इस रिपोर्ट के आने से पहले यूआइटी ने 14 जून, 2025 को ईवी चार्जिंग स्टेशन के लिए जमीन अलॉट कर दी। यानी यूआइटी को जमीन अलॉटमेंट की जल्दी थी, सर्वे रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया।


यूआइटी का तर्क है कि खसरा संख्या 1931 की रिपोर्ट नहीं आई, जबकि जल संसाधन खंड का कहना है कि इस खसरे का जिक्र आया ही नहीं। हालांकि जल संसाधन खंड की ओर से एजेंसी को दिए गए नोटिस से साफ हो गया कि यह एरिया हंस सरोवर का डूब क्षेत्र है। आखिर यूआइटी ने संबंधित विभागों से एनओसी क्यों नहीं ली? यह सवाल खड़ा है। मामला संज्ञान में आने के बाद भी यहां काम लगातार जारी है। इसे अब तक रोका नहीं गया।