
अलवर. तूफानों से डर कर नौका पार नही होती,कोशिश करने वालों की कभी हार नही होती। ये कविता उन बच्चों पर सार्थक सिद्ध होती है जिनके चेहरे पर मासूमियत है, बोलने को शब्दकोष तो है लेकिन जुबान नहीं,बोलने को जुबान है लेकिन सुनने के लिए कान नहीं, ओर देखने को आंख है लेकिन...कुछ देख नहीं सकते । फिर भी निरन्तर कुछ बनने का जज्बा ये अपने मन में संजोए हुए हैं।
अलवर-करोली स्टेट हाइवे सडक़ मार्ग पर डाबला मोड़ स्थित आधारशिला मानव विकास संस्थान झालाटाला की ओर से संचालित मूक बधीर विद्यालय में ऐसे छात्र-छात्राएं अध्ययनरत है जो कुछ आंखों से तो कुछ कानों से और कुछ बोलने से वंचित है। लेकिन इन्होंने हार स्वीकार नहीं की। यहां पर एक और आंखों से दिव्यांग विद्यार्थी ब्रेल लिपि के माध्यम से अध्ययन में जुट कर निरंतर कामयाबी की ओर अग्रसर है तो दूसरी ओर गूंगे और कान से लाचार विद्यार्थी सांकेतिक भाषा के माध्यम से सफलता के साथ आगे बढ़ रहे है। विद्यालय में अध्ययनरत कई छात्र -छात्राओं ऐसे हैँ जिनमें जन्मजात ये कमियां है। ऐसे में ये अपने पैरों पर खड़़े हो सके और दूसरों पर बोझ ना बनें इसके लिए यहां इन्हें रखा जाता है और अच्छी शिक्षा दी जाती है। इन बालको ंको देखकर एक ही बात जूबां पर आती है - खुद को कर बुलंद इतना कि किस्मत लिखने से पहले खुदा बंदे से पूछे कि बता तेरी रजा क्या है। दृष्टिहीन शिक्षक बहा रहा ज्ञान की गंगा शारीरिक खामियां झेल रहे ये विद्यार्थी अपने आप से हताश नहीं है। उनके इरादे नेक है।
इन विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे शिक्षक कुमेर सिंंह राजपूत (वी आई) निवासी कोटपूतली स्वयं आंखों से वंचित रहकर भी बच्चों के जीवन में ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। विद्यालय के संस्थापक आरसी मीना ने बताया कि आवासीय विद्यालय में आंख,कान व जुबान से दिव्यांग करीब पचास विद्यार्थी अध्ययनरत है। इनको ब्रेल स्लैट,हिन्दी डिवाइस,अंग्रेजी डिवाइस व गणित विषय के लिए टेलर फ्रेम तथा पेन की जगह इस्टाईलर्स से शिक्षा दी जा रही है। इन बच्चों में गाने और बजाने की कला इतनी अच्छी है कि यह अपनी पहचान बनाने में सक्षम है।