पतझड़, सावन, वसंत, बहार, एक वर्ष के मौसम चार...। जब भी पतझड़ आता है, यह फिल्मी गाना जुबां पर आता है। गाने में बताया है कि एक साल में चार मौसम होते हैं। इसमें पतझड़ भी शामिल है, लेकिन यह बात अलवर में सही साबित नहीं हो रही। अलवर में एक पेड़ ऐसा भी है, जो हमेशा सदाबहार रहता है।
पतझड़, सावन, वसंत, बहार, एक वर्ष के मौसम चार...। जब भी पतझड़ आता है, यह फिल्मी गाना जुबां पर आता है। गाने में बताया है कि एक साल में चार मौसम होते हैं। इसमें पतझड़ भी शामिल है, लेकिन यह बात अलवर में सही साबित नहीं हो रही। अलवर में एक पेड़ ऐसा भी है, जो हमेशा सदाबहार रहता है। इसमें कभी पतझड़ आता ही नहीं है। ये पेड़ अलवर शहर के सर्किट हाउस में लगा है और हरा भरा है। इसका नाम है काला तेंदू जो कई खूबियां लिए हुए है।
पेरिस से लाए थे महाराज जयसिंह
इतिहासकार हरिशंकर गोयल बताते हैं कि अलवर के महाराज जयसिंह वर्ष 1924 में पेरिस गए थे। वहां से लौटते समय यह दुर्लभ प्रजाति का पौधा साथ लेकर आए थे। इसके बाद इसे सर्किट हाउस में लगाया गया। इसका नाम उस समय किसी को पता नहीं था। न ही इसके फल की कोई जानकारी थी, लेकिन इसमें कभी पतझड़ आते हुए किसी ने नहीं देखा। तब से आज तक यह यहीं पर लगा हुआ है। बाद में इस पेड़ के नाम का बोर्ड काला तेंदू लगाया गया। अलवर में ऐसे पेड़ देखने को नहीं मिलते हैं। इसमें रीठा जैसे फल आते हैं।
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ये हैं खूबियां
बीकानेर की एमजीएस यूनिवर्सिटी के हैड वनस्पति शास्त्री डॉ. अनिल कुमार छगानी के अनुसार तेंदू का वनस्पतिक नाम डाइओस्पाइरस मालाबेरिका है। तेंदू ऐबेनेसी कुल का है और इसको अंग्रेजी में गौब परसीमन कहते हैं। अन्य पेड़ों की तरह इसमें पतझड़ नहीं आता है। कुछ पत्ते ही गिरते हैं, लेकिन इसके बाद ही नए आ जाते हैं। इसलिए हमेशा हरा-भरा दिखता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में तेंदू को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। तेंदू पेड़ के फल, छाल, पत्ता और पेड़ से निकलने वाले गोंद का आयुर्वेदिक महत्व है। इसका फल चीकू की तरह होता है जो पहले खट्टा होता है और बाद में मीठा हो जाता है। तेंदू की पत्तियां मध्य भारत में सबसे महत्वपूर्ण एनटीएफपी प्रजातियों में से एक है।