बिस्तर पर लेटा एक इंसान। शरीर में प्राण तो हैं लेकिन कोई हलचल नहीं। वह कुछ बोल नहीं पाता। एकटक अपने घर को ताकता रहता है। चाह कर भी परिवार के लिए कुछ न कर पाने की टीस उसकी भीगी आंखों में साफ नजर आती है। ये गिरीश शर्मा हैं।
ज्योति शर्मा/ अलवर। बिस्तर पर लेटा एक इंसान। शरीर में प्राण तो हैं लेकिन कोई हलचल नहीं। वह कुछ बोल नहीं पाता। एकटक अपने घर को ताकता रहता है। चाह कर भी परिवार के लिए कुछ न कर पाने की टीस उसकी भीगी आंखों में साफ नजर आती है। ये गिरीश शर्मा हैं। तीन साल से कोमा में हैं। हार्ट मात्र 35 प्रतिशत ही काम कर रहा है। अलवर शहर के हसन खां मेवात नगर निवासी गिरीश पहले खुशहाल जीवन जी रहे थे।
मोबाइल की छोटी सी दुकान थी। घर में पत्नी अंजू और चार बच्चे, सब कुछ खुश थे। एक दिन अचानक ब्लड प्रेशर हाई हुआ और वे ब्रेन हेमरेज के शिकार हो गए। इनका मिड ब्रेन का हिस्सा काम नहीं कर रहा है। तबीयत ऐसी बिगड़ी कि जीवनभर के लिए बिस्तर पकड़ लिया। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। गिरीश के पिता की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। बुजुर्ग मां अपने बेटे की सलामती के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करती रही।
मां की दुआएं असर करतीं, उससे पहले ही एक सड़क हादसे में गिरीश की मां की भी मौत हो गई। मां की पेंशन से ही घर चलता था। वह भी छिन गया। मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। एक दिन गिरीश की पत्नी अंजू की नौकरी चली गई। चार बच्चों का पेट भरने के साथ-साथ पति का इलाज का खर्चा उठाना भी मुश्किल हो रहा है। गिरीश के परिवार ने नेताओं-अधिकारियों से मदद मांगी, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला। इस परिवार को मदद की दरकार है।
अंजू बताती है कि अलवर में न्यूरो सर्जन की सरकारी स्तर पर सुविधा नहीं है। पति को कभी भी तबीयत बिगड़ने पर चिकित्सक के पास ले जाना पड़ता है। शरीर काम नहीं कर रहा है। यूरिन के लिए नली लगी है। बिस्तर से उठाने में कभी भी कुछ हो सकता है। ऐसे हालात में अस्पताल तक ले जाने में जान पर संकट बना रहता है। अलवर में एक ही अस्पताल में इलाज की सुविधा है जिसमें एक बार में एक से डेढ़ लाख रुपए का खर्चा आता है।
गिरीश के पिता फोरेस्ट डिपार्टमेंट से सेवानिवृत्त हुए थे। पेंशन गिरीश की मां को मिलती थी। मां की मौत के बाद पेंशन मिलना बंद हो गई। जयपुर के सरकारी अस्पताल से गिरीश का इलाज चल रहा है। अलवर से जयपुर तक ऐसे हालात में वाहन में ले जाना मुश्किल है। खर्चा भी बहुत आता है। ऐसे में यदि कोई न्यूरो सर्जन इनकी जांच कर इनका सर्टिफिकेट बनाए तो इलाज में आर्थिक मदद मिल सकती है। गिरीश की पेंशन बन जाए या आरजीएचएस का कार्ड बन जाए तो मदद मिल सकती है।