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घूमर को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा रहीं किशनगढ़बास की मैत्रेयी पालावत

राजस्थान का पारंपरिक घूमर (Ghoomar Dance) अब सोशल मीडिया से लेकर बड़े मंचों तक नई पहचान बना रहा है। इसकी पहचान देश-दुनिया तक पहुंचाने में किशनगढ़बास में जन्मी मैत्रेयी पालावत जुटी हैं। दादी-नानी को नृत्य करते देखकर शुरू हुआ उनका लगाव आज राजस्थानी संस्कृति के संरक्षण का जुनून बन चुका है।
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Oct 12, 2026
maitreyi palawat ghoomar dance
मैत्रेयी पालावत (फोटो - पत्रिका)

नवरात्र के दिनों में राजस्थान की लोक संस्कृति और पारंपरिक नृत्यों की खास पहचान देखने को मिलती है। इसी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं मैत्रेयी पालावत। उन्होंने बचपन में परिवार की महिलाओं को गणगौर और तीज के अवसर पर घूमर करते देखा था। उस समय पैदा हुआ शौक आज उनकी पहचान बन गया है। अब उनका सपना घूमर को देश के हर राज्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाना है।

दादी-नानी को देखकर जागा घूमर का शौक

किशनगढ़बास में जन्मी मैत्रेयी बताती हैं कि संयुक्त परिवार में रहते हुए उन्होंने दादी, नानी और मां को गणगौर व तीज के त्योहारों पर घूमर करते देखा। इन्हीं पलों ने उनके मन में इस पारंपरिक नृत्य के प्रति लगाव पैदा किया। हालांकि, उस समय उनके दादाजी को नृत्य पसंद नहीं था। ऐसे में वे अपने शौक को करियर में नहीं बदल सकीं।

शादी के बाद उनके जीवन में नए अवसर आए। मुंबई में उन्होंने जुंबा की लाइसेंस प्राप्त प्रशिक्षक बनने का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्हें भरतनाट्यम सीखने का मौका भी मिला। इसके बाद उन्होंने अपने पुराने शौक को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

2017 में सोशल मीडिया से शुरू हुआ सफर

मैत्रेयी ने वर्ष 2017 में पारंपरिक घूमर के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें पिता की नाराजगी का सामना करना पड़ा, लेकिन पति और मां ने उनका हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे उनके वीडियो लोगों को पसंद आने लगे और उनकी पहचान बढ़ती गई।

आज उनके यूट्यूब चैनल (YouTube Channel) पर करीब 25 हजार, इंस्टाग्राम (Instagram) पर 50 हजार और फेसबुक (Facebook) पर 50 हजार फॉलोअर्स हैं। सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह सफर अब सांस्कृतिक आयोजनों और मंचीय प्रस्तुतियों तक पहुंच चुका है।

सरकारी घूमर महोत्सव में भी मिली पहचान

वर्ष 2025 में राजस्थान सरकार के घूमर महोत्सव के प्रचार के लिए तैयार पोस्टरों, प्रमाणपत्रों और ट्रॉफियों पर उनकी तस्वीर शामिल की गई। यह उनके लिए खास उपलब्धि रही। वे विभिन्न घूमर प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार भी जीत चुकी हैं।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्होंने 111 विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देकर सामूहिक घूमर नृत्य की प्रस्तुति तैयार करवाई। उनके अनुसार, वे सवा लाख लोगों को घूमर का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। स्कूलों और कॉलेजों में कार्यशालाओं के माध्यम से पांच हजार से अधिक छात्राओं और महिलाओं को भी नृत्य सिखा चुकी हैं।

घूमर के साथ राजपूताना संस्कृति का संरक्षण

मैत्रेयी ने ‘मैत्रेयी बाईसा ग्रुप’ बनाया है। इसके माध्यम से वे घूमर के साथ राजपूताना संस्कृति के प्रचार और संरक्षण में जुटी हैं। उनके लिए घूमर केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान और मातृभूमि की सेवा का माध्यम है। उनका सपना इस लोकनृत्य को देश के हर राज्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाना है।

Updated on:
12 Oct 2026 12:09 pm
Published on:
12 Oct 2026 12:09 pm