
राजस्थान सरकार पोर्टल से लेकर ऑनलाइन प्रक्रिया इसलिए शुरू करती है कि जनता के काम आसानी से हो सकें, लेकिन पट्टा पोर्टल ही जनता के लिए सिरदर्द बना हुआ है। एक ही फाइल 6 बार नगर निगम आयुक्त के पास जाती है। उनके पास कई जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में इन फाइलों को संबंधित लोगों तक पहुंचने में समय लगता है। यह सिस्टम इसलिए विकसित किया गया थ कि जनता को बार-बार नगर निगम नहीं आना पड़े। लेकिन फाइल अटकने की वजह से अफसरों को याद दिलाना पड़ता है कि उनकी फाइलें संबंधित सीट को भेज दें। इसी कारण नगर निगम में पट्टा जारी करने की प्रक्रिया पेचीदा हो गई है।
ई-मित्र के जरिए या फिर लीज डीड की एसएसओ आइडी पर संबंधित व्यक्ति को आधार कार्ड, लैंड चेन, वोटर आइडी, आवंटन पत्र, बिजली बिल या पानी का बिल, हाउस टैक्स की रसीदें, भूखंड का नक्शा, दो गवाहों के आधार कार्ड व मोबाइल नंबर आदि दस्तावेज लगाने होते हैं। इसके बाद फाइल आगे के लिए प्रोसेसे होती है। इस दौरान कोई दस्तावेज की कमी होती है तो उसकी पूर्ति भी कराई जाती है।
जैसे ही पट्टे की फाइल पोर्टल पर अपलोड होती है, तो यह नगर निगम आयुक्त के पास पहुंचती है। वह फाइल को संबंधित लिपिक को दस्तावेज चेक करने के लिए भेजते हैं। लिपिक जैसे ही फाइल को ओके करते हैं, तो फिर से फाइल आयुक्त के पास आती और वह इस फाइल को फिर जेईएन को मौका रिपोर्ट के लिए भेजते हैं। उनकी रिपोर्ट होने के बाद फिर फाइल कमिश्नर के पास आती है और यहां से तहसीलदार के पास जाती है, जहां से पटवारी रिपोर्ट के लिए इसे भेजा जाता है। वहां से पूर्ति होने के बाद फिर फाइल आयुक्त के पास आएगी और फिर वह जोनल व साइट प्लान के लिए एटीपी के पास भेजते हैं। एटीपी कार्य करके फाइल आयुक्त की आइडी पर भेजते हैं और फिर आयुक्त लेखा विभाग में फाइल शुल्क के लिए भेजते हैं। शुल्क जमा होने के बाद आयुक्त पट्टा प्रकाशन के आदेश देते हैं। ऐसे में बार-बार फाइल आयुक्त के पास आई। आयुक्त के पास यदि काम अधिक है, तो जनता को जाकर उन्हें बार-बार बताना पड़ता है।