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राजस्थान का रण : अब राजस्थान में सामने आने लगे ऐसे नेता, पार्टी कार्यकर्ताओं को सता रही है चिंता

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Oct 05, 2018
Rajasthan Ka Ran : New Faces In Politics Seeing In Rajasthan Elections
राजस्थान का रण : अब राजस्थान में सामने आने लगे ऐसे नेता, पार्टी कार्यकर्ताओं को सता रही है चिंता

विधानसभा चुनावों का माहौल बनने के साथ ही हर विधानसभा क्षेत्र में दावेदार ताल ठोकते नजर आ रहे हैं। दोनों प्रमुख दलों के साथ ही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कई बाहरी और क्षेत्र के ही गुमनाम चेहरे सामने आ रहे हैं। इससे सबसे ज्यादा चिंतित ऐसे कार्यकर्ता और पदाधिकारी हैं जो पांच साल से चुनाव का इंतजार कर पार्टी की सेवा के आधार पर टिकट का दावा कर रहे हैं। कई विधानसभा क्षेत्रों में अचानक से ऐसे दावेदारों के हॉर्डिंग्स लगने शुरू हो गए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में पैराशूटर टिकट लाने में कामयाब रहे तो पार्टियों के पाले बिखरना भी तय है।

कार्यकर्ताओं को लगता भी है कि हर बार कोई न कोई नया चेहरा चुनाव में उतार दिया जाता है जिसके साथ मजबूरी में खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन इस बार पार्टी में बिना कार्य किए टिकट लेकर आने वाले का साथ देने में आना-कानी होने लगी है। जिसका फायदा तीसरे मोर्चे के रूप में आने वाले या अन्य पार्टी के दावेदारों को हो सकता है। कुछ निर्दलीय ताल ठोक सकते हैं तो कुछ किसी तीसरे दल से दम भरेंगे। इस बार के चुनाव में पैराशूटर लाने वाले और जनता की पसंद के प्रत्याशियों को नकारने वाली पार्टी ही ठगाएगी। जैसा पिछली बार कांग्रेस के साथ हो चुका है। टिकट कांग्रेस व भाजपा के बराबर-बराबर बदले जाने कीसंभावना है।

पैराशूटर का यहां डर अधिक

पैराशूटर का अलवर शहर, रामगढ़, ग्रामीण, किशनगढ़बास, बहरोड़, थानागाजी, बानसूर, तिजारा में अधिक है। इनमें से कुछ सीट ऐसी हैं जहां से पिछली बार के हारे प्रत्याशी टिकट मांगने लायक नहीं बचे। कुछ जगह भाजपा नए चेहरों पर दांव खेलने के मूढ में हैं। जिसका शीर्ष नेतृत्व बराबर फीडबैक ले रहा है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में बड़ी हार झेली है। जिसका भी पुराने प्रत्याशियों को नुकसान होना तय है। बानसूर में मोदी लहर में भाजपा की बड़ी हार वजह है। थानागाजी में कांग्रेस पार्टी तीसरे नम्बर रही। बहरोड़ का चुनाव फेरबदल वाला होगा।

सिंह चुनाव लड़े तो चेहरे न्यारे होंगे

पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह खुद अलवर शहर की सीट से चुनाव लड़े तो टिकटों का गणित भी बदल सकता है। उनके चुनाव नहीं लडऩे से सोशल इंजीनियरिंग को अधिक साधने का प्रयास रहेगा। वैसे भी जिला मुख्यालय की सीट के चुनाव से पूरे जिले में संदेश जाता है। शहर से भी कुछ ऐसे चेहरे दावा ठोकने लगे हैं जिन्होंने कभी पार्टी में रहकर काम ही नहीं किया।

हर विधानसभा क्षेत्र में यह डर

इस समय भाजपा व कांग्रेस दोनों प्रमुख पार्टियों के टिकट के लिए दावेदार जुटे हुए हैं। जिले की सभी 11 सीटों पर इस तरह का डर दावेदारों के बीच है। कई बार सर्वे रिपोर्ट सटीक नहीं होती तो कई बार ऊपरी नेताओं के नजदीक व दूरी का फायदा -नुकसान भी हो जाता है। इसी डर को खत्म करने में दावेदार अपनी ताकतक लगा रहे हैं। हर कोई नीचे से ऊपर तक का जुगाड़ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।

Published on:
05 Oct 2018 10:34 am