अरावली की वादियों के बीच बसे सूरजमुखी और मौनी बाबा गौशाला के पास स्थित सरिस्का विस्थापितों की कॉलोनी आज सरकारी सिस्टम की बेरुखी का जीता-जागता उदाहरण बन गई है। नगर परिषद तिजारा क्षेत्र में आने के बावजूद यहां के 1100 लोग आज भी आदिम युग जैसी परिस्थितियों में जीने को मजबूर हैं। न सड़कें हैं, न अस्पताल, और शिक्षा के नाम पर केवल उड़ती हुई धूल और टूटी झोपड़ी बची है।
सरिस्का टाइगर रिजर्व से विस्थापित होकर आए परिवारों को सरकार ने बेहतर भविष्य और मूलभूत सुविधाओं का सपना दिखाकर यहां बसाया था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। तिजारा नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली इस कॉलोनी में करीब 180 परिवार रहते हैं, जिनकी कुल आबादी 1100 के पार है। विडंबना यह है कि शहरी क्षेत्र का हिस्सा होने के बाद भी यहां विकास के नाम पर सिर्फ खोखले वादे हैं।
शिक्षा की स्थिति यहां सबसे भयावह है। मुख्य सड़क से करीब 3 किलोमीटर दूर, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और मिट्टी के टीलों के बीच एक छोटी सी झोपड़ी को स्कूल का रूप दिया गया था। स्थानीय निवासियों ने बताया कि हाल ही में चली तेज हवाओं ने उस झोपड़ी की छत (प्लास्टिक की तिरपाल) को भी उड़ा दिया।
स्कूल के नाम पर यहां न तो कोई पक्का कमरा है, न कार्यालय और न ही बच्चों के लिए फर्नीचर। आलम यह है कि
अध्यापकों के बैठने के लिए मात्र दो टूटी हुई प्लास्टिक की कुर्सियां हैं। बच्चों के पास बैठने के लिए दरी-पट्टी तक नहीं है, उन्हें कड़कती धूप और उड़ती धूल के बीच मिट्टी में बैठकर पढ़ना पड़ता है। पेयजल और शौचालय जैसी अनिवार्य सुविधाओं का यहां नामो निशान नहीं है।
स्थानीय निवासी धर्म सिंह और अन्य विस्थापितों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने विस्थापन के समय सड़क, शिक्षा, चिकित्सा, बिजली और पानी की सुविधा देने का वादा किया था। लेकिन आज यहां बिजली मात्र 6 घंटे आती है। रास्ते इतने खराब हैं कि कोई भी निजी स्कूल का वाहन अंदर आने को तैयार नहीं होता। बीमार होने पर अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस तक का पहुंचना दूभर है।
नगर परिषद क्षेत्र में होने के नाते इन परिवारों को शहरी सुविधाओं की उम्मीद थी, लेकिन यहां की उबड़-खाबड़ गलियां और कच्चे नाले प्रशासन के दावों की पोल खोल रहे हैं। बच्चों को पढ़ाई के लिए तिजारा शहर जाना पड़ता है, लेकिन परिवहन का कोई साधन न होने के कारण कई बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट रही है।
विस्थापित परिवारों ने अब सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनके बच्चों के लिए कम से कम एक पक्का स्कूल भवन और आवागमन के लिए सड़क का निर्माण जल्द से जल्द कराया जाए, ताकि उनका 'विस्थापन' अभिशाप न बने।