बेटा और बेटी का अंतर अब खत्म हो गया है। लोगों की सोच बदलने लगी है। इससे अलवर की तस्वीर बदलने लगी है। अब बेटियों को जन्म देने में महिलाएं गर्व महसूस कर रही हैं। बेटियां अब बोझ नहीं, बल्कि परिवार की शान बन रही हैं।
बेटा और बेटी का अंतर अब खत्म हो गया है। लोगों की सोच बदलने लगी है। इससे अलवर की तस्वीर बदलने लगी है। अब बेटियों को जन्म देने में महिलाएं गर्व महसूस कर रही हैं। बेटियां अब बोझ नहीं, बल्कि परिवार की शान बन रही हैं। अलवर जिले के लिंगानुपात में बीते दस सालों में काफी अंतर आया है।
वर्ष 2015 में अलवर में 1000 हजार बेटों की तुलना में 912 बेटियों ने जन्म लिया था, वहीं वर्ष 2024-25 में बेटियों की संख्या 961 तक पहुंच गई है। लक्ष्मणगढ, थानागाजी व रैणी में तो बेटियों की संख्या बेटों से अधिक हो गई है। लक्ष्मणगढ़ में वर्ष 2015 में एक हजार बेटों पर 984 बेटियां थीं, जो 2023 में 1020 और 2024 में 1233 हो गई हैं। इसी तरह थानागाजी में 2015 में बेटियों की संख्या 1030 थी, जो 2024 में 1050 हो गई है। रैणी में 2015 में बेटियों की संख्या 1078 थी, जो अब 1096 हो गई है।
समाज में बेटियों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। शहरी क्षेत्र में कई ऐसे परिवार भी जहां केवल एक ही बच्चा है, वह भी लड़की। दंपती स्वेच्छा से दूसरा बच्चा पैदा नहीं करना चाहते।
न केवल शहरी क्षेत्र में बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियां पढ़-लिख रही हैं। नौकरीपेशा लड़कियों की संख्या बढ़ी है। पढ़ाई के साथ खेल-कूद में बालिकाएं अधिक संख्या में आगे आई हैं। सोनोग्राफी सेंटरों पर भ्रूण लिंग परीक्षण की जांच पर रोक लगी है। इसके साथ ही समय समय पर भ्रूण हत्या रोकने के लिए डिकॉय ऑपरेशन भी किए गए हैं।
इनके कारण भी भ्रूण हत्या में तेजी से गिरावट आई और बेटियों ने जन्म लिया। बेटियों के जन्म पर पौधे लगाना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शपथ के साथ चिकित्सा विभाग, शिक्षा विभाग, महिला अधिकारिता विभाग सहित अन्य विभागों की ओर से बहुत सी योजनाएं चलाई जा रही हैं।
चिकित्सा विभाग की ओर से सोनोग्राफी सेंटरों पर लिंग परीक्षण पर रोक लगाई गई है। बालिकाओं के जन्म पर आर्थिक मदद दी जाती है। प्रत्येक ब्लॉक में उजाला क्लीनिक खोले गए हैँ। -डॉ. योगेंद्र शर्मा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, अलवर