आगामी चुनाव में कांग्रेस को मजबूती प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश में 19 नए जिलों की घोषणा की, लेकिन ये नए जिले क्या कांग्रेस को चुनाव में संजीवनी दे पाएंगे। आइए जानते अलवर जिले में कांग्रेस की क्या है हालत।
अलवर. आगामी विधानसभा चुनाव में करीब छह महीने का समय शेष है, इस कारण प्रमुख राजनीतिक दलों ने तैयारी शुरू कर दी है। अलवर जिले में गत विधानसभा चुनाव के परिणाम में कांग्रेस व भाजपा को मिले वोटों में मात्र 0.63 फीसदी यानी मात्र 11689 वोटों का अंतर होने से दोनों ही दल अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने की जुगत में हैं। कांग्रेस की उम्मीद नए जिलों की घोषणा और महंगाई राहत शिविरों पर टिकी है, वहीं भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का आसरा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अलवर जिले में 5 सीटें मिली थी। वहीं बसपा के टिकट पर जीते दो विधायक बाद कांग्रेस में शामिल हो गए और दो निर्दलीयों ने कांग्रेस को पूरे साढ़े चार साल समर्थन दिया। यानी अलवर जिले से कांग्रेस सरकार को 9 विधायकों का समर्थन मिला, जो सरकार के स्थायीत्व का आधार भी बना। वहीं भाजपा मात्र दो सीटों पर ही सिमट गई। पिछले बार भाजपा के हाथ से फिसली सत्ता में अलवर के योगदान की कमी खली। वर्ष 2013 में प्रदेश में भाजपा को सत्ता पर काबिज कराने में अलवर जिले की बड़ी भूमिका रही। अलवर जिले से जीते भाजपा के 9 विधायक सत्ता का स्तंभ बन सके।
कांग्रेस को नए जिलों की घोषणा से आस
मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों अलवर में दो नए जिलों की घोषणा की। इनमें खैरथल एवं कोटपूतली- बहरोड़ नए जिले शामिल हैं। कांग्रेस सरकार ने इन दो नए जिलों की घोषणा कर जिले के 11 विधानसभा क्षेत्रों में से 5 को साधने का प्रयास किया है। खैरथल को जिला बनाने की घोषणा कर किशनगढ़बास, तिजारा, मुण्डावर विधानसभा क्षेत्रों को साधने का प्रयास किया है। वहीं कोटपूतली- बहरोड़ को नया जिला घोषित कर अलवर जिले के बहरोड़, बानसूर विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही अन्य क्षेत्रों का साधने का प्रयास किया है।
राहत शिविरों पर भी फोकस
कांग्रेस का इन दिनों पूरा फोकस विभिन्न् स्थानों पर लग रहे महंगाई राहत शिविरों पर है। इन शिविरों के माध्यम से लोगों को राज्य सरकार की ओर से दी जा रही राहत का अहसास करा सत्ता विरोधी लहर का असर कम करने के प्रयास में जुटी है।