अंबिकापुर

कभी पढ़ाई छोड़ खेतों में काम करते थे ये आदिवासी बच्चे, अब कर रहे बड़े-बड़े कारनामे

आज ये बच्चे अपने काम से प्रशासन व समाज के जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों के लिए पेश कर रहे मिसाल, मिल रही सराहना

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Tribal youth

मैनपाट. संगवारी खबरिया के बच्चों ने मैनपाट पहुंच कर मुख्य कार्यपालन अधिकारी एसएन तिवारी को मेमोरेंडम प्रस्तुत कर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई की मांग की। बच्चों द्वारा प्रस्तुत किए गए मेमारेंडम में बाल विवाह जैसी कुप्रथा व अन्य गंभीर समस्या को लेकर बनाए गए वीडियो ने एक बार फिर समाज के जिम्मेदारों व आम लोगों के लिए भी आंख खोलने का काम किया है। 20 बच्चों के इस समूह ने समाज के लिए एक मिसाल पेश की है। पहले ये बच्चे पढ़ाई छोड़कर खेतों में काम करते थे।


संगवारी खबरिया सरगुजा के 20 शाला त्यागी आदिवासी बच्चों का समूह है जो अपने गांव, बच्चों से जुड़े तथा अन्य विषयों पर न्यूज वीडियो बनाते हैं। यूनिसेफ और एमएसएसव्हीपी संस्था के संयुक्त संचालन में यह बच्चे वीडियो और पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे हैं, जो बच्चे दो साल पहले पढाई छोड़ खेतों में काम करते थे, वह आज गांव के युवा पत्रकार बनकर बाल अधिकारों पर गांव-गांव में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं।

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विगत तीन वर्ष में इन बच्चों ने कई गंभीर समस्याओं की पहचान कर उस पर कई वीडियो बनाये हैं। बच्चों द्वारा उठाए गए मुद्दों का समाधान करवाने के उद्देश्य से संगवारी खबरिया ने ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों के लिए स्क्रीनिंग कार्यक्रम का आयोजन बिजलहवा बालक आश्रम में किया गया।

मुख्य अतिथि के रूप में मैनपाट के तहसीलदार आरएस वर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में संगवारी खबरिया के बच्चों ने मैनपाट के सीईओ एसएन तिवारी को मेमोरेंडम देकर सभी मुद्दों का जल्द से जल्द निराकरण करने की मांग की।

इस पर सीईओ ने कहा कि बच्चे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और हम उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर कार्रवाई करेंगे। इस अवसर पर संगवारी खबरिया की प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर श्रुति अप्सिगिकर, दीपक बागरी, गांव के प्रतिनिधि, शिक्षक और सभी बच्चे उपस्थित रहे।


वीडियो बनाकर इन गंभीर मुद्दों को उठाया
1. बाल विवाह-मैनपाट की लड़कियों की शादी 18 वर्ष के पहले ही कर दी जाती है और कुछ माता-पिता कानून के डर से शादी पहले पक्की कर देते हंै, फिर उम्र पूरी होने के बाद भेज देते हैं।


2. बाल बंधुआ मजदूरी- मैनपाट के कई गांव के बच्चे पढ़ाई छोड़कर उच्च जाति के घरों में साल भर के लिए गाय-भैंस चराने का काम करते हैं। इस प्रकार की बंधुआ मजदूरी से पीडि़त कुछ बच्चों ने अपनी आप बीती बताई कि कैसे उनके साथ बुरा व्यवहार होता है।


3. माझी बच्चे खेतों में ज्यादा दिखते हैं- मांझी समाज के बच्चे स्कूलों में कम दिखाई देते हंै और खेतों में ज्यादा। स्कूल में शिक्षक अच्छे से नहीं पढ़ाते इस कारण कुछ माता-पिता निजी स्कूलों की तरफ रुख कर रहे हैं, बारि अपने बच्चों को खेतों में काम के लिए ले जाते हंै।


4. खराब सड़क और खेल मैदान- बिहीपारा, नर्मदापुर गांव में खेल का मैदान नहीं होने से बच्चे कच्ची सड़क पर खेलते हैं। इसी पारा में लोग सड़क से भी परेशान हंै। सरपंच के आश्वासन के बावजूद न तो सड़क बनी और न ही मैदान।

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Published on:
29 Jul 2018 02:41 pm
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