
संजीव शर्मा की रिपोर्ट...
(अमृतसर): भारत-पाक सीमा पर रोजाना शाम को रिट्रीट सैरेमनी में सामान्य की भांति सोमवार को भी हजारों लोग मौजूद थे, लेकिन छत्तीस साल बाद पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से रिहा होकर भारत लौटे जयपुर निवासी गजानंद को इन हजारों लोगों में उन्हे अपने एक की तलाश थी जिसे वह पहली नजर में पहचान सके। क्योंकि पिछले छत्तीस वर्षों के दौरान पूरी की पूरी नस्ल ही बदल गई और पीढिय़ां जवान हो गई। करीब साढे तीन दशक बाद सोमवार को अपने देश में आकर भी वे खुद को बेगाना समझते रहे। गजानंद शर्मा पथराई आंखों व रूंधे हुए गले से भीड़ में किसी अपने को तलाश रहे थे। भले ही गजानंद पड़ोसी मुल्क में छत्तीस साल की सजा काटकर आए हैं लेकिन अब अपनों से मिलने के इंतजार में गजानंद की सहनशक्ति जवाब दे रही थी। जैसे ही उसने भारत में प्रवेश किया तो भारी शोरगुल के साथ उसका स्वागत किया गया लेकिन गजानंद ने डरे, सहमे हालात में भारतीय चैक पोस्ट में प्रवेश किया।
भारत में आने के करीब आधे घंटे तक उसने किसी के साथ कोई बात नहीं की । वे हर व्यक्ति को बेहद गहरी नजर के साथ देख रहे थे। गजानंद की बॉडी लैंगवेज यह बता रही थी कि वे इस भीड़ में किसी ऐसे अपने को तलाश रहे है जिसे वे देखते ही पहली नजर में पहचान ले। सुरक्षा की दृष्टि से विदेश मंत्रालय व बीएसएफ ने गजानंद के परिजनों को यहां आने की इजाजत नहीं दी थी। गजानंद भारत तो आ गए है लेकिन वे अपने परिजनों से कब मिल पाएगें। इस प्रक्रिया को पूरी तरह से गोपनीय रखा गया। गजानंद से बीएसएफ के आला अधिकारियों ने बातचीत करने का प्रयास किया लेकिन वे बेहद मानसिक दबाव में दिखाई दे रहे थे। जिसके चलते उन्होनें कुछ बात नहीं की बस यहां-वहां निहारता रहे।