Systemic Indifference : एक तरफ एक आदिवासी परिवार ने अपनी 15 साल की जवान बेटी को खो दिया, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य महकमे की संवेदनहीनता ने उनके इस गहरे दुख में नमक छिड़कने का काम किया।
Systemic Indifference :मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के बहादुरपुर से व्यवस्थाओं को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। यहां एक तरफ एक आदिवासी परिवार ने अपनी 15 साल की जवान बेटी को खो दिया, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य महकमे की संवेदनहीनता ने उनके इस गहरे दुख में नमक छिड़कने का काम किया। पोस्टमार्टम के बाद शव को घर ले जाने के लिए जब अस्पताल प्रबंधन कोई वाहन उपलब्ध नहीं करा सका तो बेबस परिजन अपनी बेटी की लाश को चादर में लपेटकर, हाथों में लटकाकर 10 किलोमीटर दूर स्थित अपने गांव के लिए पैदल ही निकल पड़े।
मृतका का पोस्टमार्टम रविवार को बहादुरपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हुआ था। इसके बाद परिजन शव को अपने गांव खेरोदा चक ले जाने के लिए एंबुलेंस या शव वाहन का इंतजार करते रहे। लेकिन अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। अपनी मृत बेटी के शव के पास बैठे परिजन करीब तीन घंटे वाहन का इंतजार करते रहे। जब कोई मदद नहीं मिली तो हताश परिजन ने पहले ये योजना बनाई कि, 10 किमी दूर अपने गांव पैदल जाकर वहां से खटिया (चारपाई) लाएं और उस पर शव रखकर ले जाएं। लेकिन समय बीतता देख उन्होंने बेटी के शव को एक चादर में लटकाया और उसे दोनों सिरों से पकड़कर पैदल ही गांव की ओर चल पड़े।
सड़क पर इस अमानवीय और दर्दनाक दृश्य को देखकर हर कोई सन्न रह गया। इसी बीच एक युवक का दिल यह दृश्य देखकर पसीज गया। उसने इंसानियत का परिचय देते हुए अपनी कार से शव को परिजन समेत उनके गांव तक पहुंचाया।
खेरोदा चक निवासी 41 वर्षीय रामचरण आदिवासी की 15 वर्षीय बेटी गन्तोबाई ने शनिवार को आत्महत्या कर ली थी। पिता रामचरण ने पुलिस को बताया कि, उस दिन परिवार मेकुआ गांव में एक रिश्तेदार की शादी में जाने की तैयारी कर रहा था। बेटी ने मां से कहा कि, वो थोड़ी देर आराम करना चाहती है। उस समय बाहर तेज आंधी-तूफान आ रहा था। कुछ देर बाद जब मां सविता बाई की नींद खुली और उसने कमरे में बेटी को फांसी के फंदे पर लटका देखा। पत्नी की चीख सुनकर रामचरण ने जीवित होने की आस में हसिया से रस्सी काटकर बेटी को नीचे उतारा, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।
इस घटना ने स्थानीय स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी है। एक आदिवासी परिवार को इस तरह अपनी बेटी का शव चादर में टांगकर ले जाने को मजबूर होना, स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत को बयां करता है। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर रोष है कि, आखिर करोड़ों का बजट होने के बाद भी एक गरीब परिवार को संकट के समय शव वाहन क्यों नसीब नहीं हुआ।