HIGHLIGHTS: अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. नजीबुल्लाह के भाई हैं सेदिकुल्लाह राही सेदिकुल्लाह राही ने बताया कि पाकिस्तान तालिबान का समर्थन कर रहा है 'तालिबान के जरिए अफगानिस्तान को अस्थिर करना चाहता है पाकिस्तान'
जिनेवा। अफगान शांति समझौते ( Afghan Peace Agreement ) को लेकर 29 फरवरी को अमरीका-तालिबान ( America-Taliban Agreement ) के बीच एक अहम समझौता हुआ, लेकिन उसके बाद भी हमले नहीं थम रहे हैं। तालिबान ने साफ कर दिया है कि समझौता हो चुका हो, इसलिए वे विदेशी सैनिकों को निशाना नहीं बनाएंगे, लेकिन सरकार के खिलाफ उनका जंग जारी रहेगा।
अब इस बीच एक ऐसी खबर सामने आई है, जिससे पाकिस्तान के असली चेहरा फिर से बेनकाब हो गया है। दरअसल, अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. नजीबुल्लाह के भाई सेदिकुल्लाह राही ने खुलासा किया है कि तालिबान के पीछे पाकिस्तान का समर्थन है। उन्होंने ये बताया है कि पाकिस्तान मौजूदा अफगान सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए तालिबान की मदद कर रहा है।
स्वीट्जरलैंड के जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के 43वें सत्र के मौके पर मीडिया से बात करते हुए सेदिकुल्लाह ने कहा कि हाल में हुए अमरीका-तालिबान समझौता सही नहीं है और ये अफगानिस्तान के लोगों की इच्छा के खिलाफ है।
तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन
सेदिकुल्लाह राही ने आगे बताया कि जब से अमरीका-तालिबान के बीच शांति समझौता हुआ है, तब से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI तालिबान का समर्थन कर रही है। उन्होंने बताया कि तालिबान अफगानिस्तान में पाकिस्तान सैन्य इच्छा का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
सेदिकुल्लाह ने साफ कर दिया कि व अमरीका-तालिबान समझौते को नहीं मानते हैं और वे इस पर विश्वास भी नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि न तो मैं इस समझौते से सहमत हूं और न ही अफगानिस्तान में इस पर कोई नागरिक विश्वास करता है। इस समझौते से अफगानि नागरिक परेशान हैं।
सेदिकुल्लाह ने आगे यह भी कहा कि तालिबान एक धार्मिक कट्टरपंथी समूह है। इसलिए अफगानिस्तान में लोग उसे नहीं चाहते चाहते हैं। अफगानिस्तान एक इस्लामी समाज है और पाकिस्तान तालिबान के जरिए अपना शासन करना चाहता है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि तालिबान अफगानिस्तान में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करता है।
14 महीने में होगी विदेशी सैनिकों की वापसी
आपको बता दें कि बीते 29 फरवरी को कतर की राजधानी दोहा में अमरीका-तालिबान के बीच करीब 50 देशों के प्रतिनिधियों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते में 14 महीने के अंदर अमरीका व अन्य विदेशी सैनिकों की वापसी की बात कही गई है।
मौजूदा समय में अफगानिस्तान में 13 हजार अमरीकी सैनिक तैनात हैं। पहले चरण में करीब 5 हजार सैनिकों की वपासी होगी। हालांकि ट्रंप ने समझौते के एक दिन बाद ही ये साफ कर दिया था कि यदि इसका उल्लंघन किया गया तो इस बार इतनी बड़ी फौज भेजेंगे कि किसी ने देखा नहीं होगा।
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