सीरिया में पिछले 7 सालों से गृह युद्ध चल रहा है। रूस और ईरान सीरिया के साथ हैं। अमरीका, तुर्की और सऊदी अरब विद्रोहियों का साथ दे रहे हैं
नई दिल्ली : सीरिया में गृहयुद्ध चल रहा है। शनिवार को अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन ने सीरिया के कई सैन्य ठिकानों पर हमलों किए। जिससे सीरिया एक बार फिर से पूरी दुनिया में खबरों में आ गया है। लेकिन आखिर दक्षिण-पश्चिम एशिया के इस देश में चल क्या रहा। जहां पर अब तक 3 लाख लोग मारे जा चुके हैं। आधा सीरिया विस्थापित हो चुका है। तो चलिए हम आप को बताते हैं।
2011 में शुरू हुई बगावत
जंग की चिंगारी 2011 में लगी। कैसे बगावत हुई उससे पहले आप को बता दें कि वर्ष 2000 में अपने पिता हाफेज अल-असद की जगह सत्ता पर काबिज हुए बशर अल-असद। 2011 में राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ बगावत शुरू हुई। अरब के कई देशों में सत्ता के विरोध में बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ। असहमत बशर अल असद ने विरोधियों को कुचलना शुरू किया। जिसके बाद 2012 में गृहयुद्ध चरम पर पहुंच गया, विरोधियों ने हथियार उठा लिए। विद्रोही समूह ने कुछ हिस्सों में समानांतर सरकरार बना ली। असद ने इसे 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया। विद्रोहियों और असद सरकार के बीच की लड़ाई और आगे निकल गई। सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताकतों ने प्रवेश किया। इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा दखल सामने आया। सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध रण बन गया।
पड़ी शिया बनाम सुन्नी की दरार
बशर अल असद शिया हैं। वहां पर शिया अल्पसंख्यक हैं। सुन्नी मुस्लिम समुदाय करीब 70 प्रतिशत हैं और 13 प्रतिशत हैं शिया, वहीं 10 फीसदी ईसाई और 3 फीसदी हैं डुरूज धर्म को मानने वाले। सीरिया में सांप्रदायिकता भी देखने को मिली और आरोप बाहरी देशों पर लगे। शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई। शिया बनाम सुन्नी की दरार की वजह से अत्याचार और बढ़ा और हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया।
कौन देश किस की तरफ ?
सीरिया में गृयुद्ध होने के बाद जिहादी संगठन भी वहां जुड़ने लगे। हयात ताहिर अल-शम ने अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-नुसरा फ्रंट से गंठबंधन किया। दूसरी तरफ इस्लामिक स्टेट का उत्तरी और पूर्वी सीरिया के व्यापक हिस्सों पर नियंत्रण हो गया। सरकारी बलों, विद्रोही गुटों, कुर्दिश चरमंथियों, रूसी हवाई हमलों के साथ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ। यहां आप को बता दें कि तुर्की कुर्द लड़ाकों की संस्था वाईपीजी को आतंकवादी संगठन और प्रतिबंधित राजनीतिक गुट कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी की शाखा मानता है। ईरान, लेबनान, इराक, अफगानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरियाई सेना की तरफ से लड़ने के लिए पहुंचे। रूस और ईरान सीरिया की मदद को सामने आए, दोनों देशों ने सीरिया को हथियार और पैसे से मदद की। अमरीका, तुर्की और सऊदी अरब विद्रोहियों का साथ दे रहा है। इजरायल, ईरान के दखल से इतना परेशान है कि उसने कई हिज़ुबुल्ला ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। असद ने अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाकों में सितंबर 2015 में हवाई हमले शुरू किए। अमरीका का कहना है कि सीरिया को तबाह करने के लिए राष्ट्रपति असद जिम्मेदार हैं। 2014 से लेकर अब तक अमरीका ने सीरिया में कई हवाई हमले किए हैं। हाल ही में रासायनिक हमले में कम से कम 70 लोगों की जान जाने की भी खबर आई है । आरोप राष्ट्रपति बशर पर लगे जिसे उन्होंने खारिज कर दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि 500 से अधिक लोगों में रासायनिक हमले का असर होने के लक्षण पाए गए हैं।
युद्ध की वजह से जिंदगी बनी नरक
सीरिया में सात साल से चल रही जंग कि वजह से वहां लोगों का जीवन नरक बन गया है। सैकड़ों इमारतें खंडर बन गई है। मानवीय सहायता लोगों के पास नहीं हैं। लाखों की तादाद में आम लोग गोलीबारी के बीच फंसे हुए हैं और मानवीय सहायता के लिए तरस रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पिछले पांच सालों में कम से कम सीरिया में ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं। हालांकि अगस्त 2015 के बाद से संयुक्त राष्ट्र ने मरने वालों की संख्या को अपडेट करना बंद कर दिया है। कई संगठनों का कहना है कि 3 लाख 21 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं। आधा सीरिया विस्थापित हो चुका है। सीरिया से भागकर लोग तुर्की, लेबनान, इराक, जॉर्डन, और यूरोप जा रहे हैं। इजरायल ने किसी भी सीरियाई नागरिक को शरण नहीं दी है। इजरायल और सीरिया दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं है। सीरीया युद्ध कब खत्म होगा यह किसी को पता नहीं है। वैसे पूर्वी गूटा क्षेत्र में डूमा विद्रोहियों के कब्ज़े वाला आख़िरी इलाका बचा है।