सभी देवी-देवता पूजनीय हैं और उन्हें प्रणाम करना सही है, लेकिन नियमित पूजा के लिए किसी एक इष्ट देव का चयन करना बेहतर माना गया है। इससे मन की एकाग्रता बढ़ती है और पूजा का सही फल प्राप्त होता है।
भारतीय परंपरा में देवी-देवताओं की पूजा का बहुत गहरा महत्व है। शास्त्रों में यह साफ कहा गया है कि सभी देवी-देवता पूजनीय हैं और किसी एक की पूजा करने से दूसरे की अवहेलना नहीं होती। आप चाहें तो सभी देवी-देवताओं को प्रणाम कर सकते हैं, उनका स्मरण कर सकते हैं और उनसे आशीर्वाद मांग सकते हैं। इसमें कोई दोष या विवाद नहीं है।
जब व्यक्ति एक साथ बहुत सारे देवी-देवताओं की विधिवत पूजा करने लगता है, तो अक्सर उसकी एकाग्रता बंट जाती है। मन एक स्वरूप पर स्थिर नहीं रह पाता और पूजा केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाती है। पूजा का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब मन, भाव और श्रद्धा एक दिशा में केंद्रित हों।
हमारी सनातन परंपरा में इष्ट देव की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। इष्ट देव वह देवी या देवता होते हैं, जिनके प्रति व्यक्ति की श्रद्धा, आस्था और भावनात्मक जुड़ाव सबसे अधिक होता है। किसी को भगवान शिव प्रिय होते हैं, तो किसी को श्रीराम, श्रीकृष्ण, माता दुर्गा या गणपति।
मुख्य रूप से अपने इष्ट देव की पूजा करने से साधक को मानसिक शांति, स्थिरता और बेहतर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है।
इष्ट देव की पूजा करने का अर्थ यह नहीं है कि बाकी देवी-देवताओं को भुला दिया जाए। सभी देवी-देवताओं को नमस्कार करना, उनका नाम लेना और उनका सम्मान करना पूरी तरह उचित है। आप संक्षिप्त रूप से प्रणाम करें, लेकिन अपनी नियमित पूजा और साधना किसी एक देवी या देवता पर केंद्रित रखें।
जब पूजा एक ही स्वरूप पर केंद्रित होती है, तो मन जल्दी स्थिर होता है। मंत्र जाप, ध्यान और प्रार्थना में गहराई आती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, नकारात्मक विचार कम होते हैं और जीवन में संतुलन बना रहता है। यही कारण है कि एकाग्रता के साथ की गई पूजा अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।