धर्म/ज्योतिष

गुजरात के सोमनाथ मंदिर की हुबहू प्रतिकृति है डूंगरपुर का देव सोमनाथ मंदिर

Dev Somnath Mandir: बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि गुजरात से सटे दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर जिले में हुबहू सोमनाथ मन्दिर जैसा एक मंदिर है जिसका नाम देव सोमनाथ मंदिर है।

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May 21, 2026
Gopendra Nath Bhatt

आज जब देश भर में गुजरात के सुप्रसिद्ध मंदिर सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने पर उसके अमृत वर्ष समारोह और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के इस अवसर पर उसमें शामिल होने की चर्चा हों रही है वहीं दूसरी और बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि गुजरात से सटे दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर जिले में हुबहू सोमनाथ मन्दिर जैसा एक मंदिर है जिसका नाम देव सोमनाथ मंदिर है। सोमनाथ मंदिर की हुबहू प्रतिकृति डूंगरपुर का देव सोमनाथ मन्दिर वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई)द्वारा संरक्षित धरोहर है जोकि स्थापत्य कला का एक अद्भुत एवं बेजोड़ नमूना है ।

अद्भुत स्थापत्य और निर्माण शैली

देवसोमनाथ मंदिर डूंगरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 24 किलोमीटर दूर सोम नदी के तट पर स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अद्वितीय वास्तुकला है। तीन मंजिला यह विशाल मंदिर 108 पत्थर के स्तंभों पर खड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी सीमेंट, चूना या गारे का उपयोग नहीं किया गया है। विशाल पत्थरों को विशेष तकनीक से इस प्रकार जोड़ा गया है कि सदियों बाद भी आँधी, तूफ़ान और मूसलाधार बारिश में भी यह मजबूती से खड़ा है। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर उकेरी गई सुंदर नक्काशी तत्कालीन शिल्पकला की समृद्ध उत्कृष्टता को दर्शाती है। मंदिर का गर्भगृह अत्यंत शांत और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करने वाला है। यहाँ स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है।स्थानीय लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण देवताओं ने एक ही रात में किया था, जिससे इसकी पौराणिक महत्ता और बढ़ जाती है।

वागड़ अंचल की आध्यात्मिक पहचान

अरावली पर्वतमाला की शांत वादियों के बीच स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर अपनी भव्यता और अनूठी निर्माण शैली के कारण देशभर के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह मंदिर और भगवान शिव को समर्पित है।इस मंदिर की स्थापत्य शैली गुजरात के सुप्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर से मिलती-जुलती दिखाई देती है, इसी कारण इसका नाम “देवसोमनाथ” पड़ा। देवसोमनाथ मंदिर दक्षिणी राजस्थान आदिवासी वागड़ अंचल की धार्मिक आस्था, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक गौरव का अद्भुत प्रतीक है।

सोमनाथ और देवसोमनाथ का ऐतिहासिक अंतर

हालांकि गुजरात का सोमनाथ मंदिर डूंगरपुर के देवसोमनाथ मंदिर की तुलना में बहुत अधिक प्राचीन माना जाता है।इतिहास और पुराणों के अनुसार सोमनाथ मंदिर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और इसकी स्थापना का संबंध पौराणिक काल से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक रूप से सोमनाथ मंदिर का अस्तित्व प्रारम्भिक शताब्दियों से माना जाता है। कई इतिहासकार इसे लगभग 1500 से 2000 वर्ष या उससे भी अधिक पुराना मानते हैं, जबकि इसकी पौराणिक मान्यता इससे कहीं अधिक प्राचीन है। यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है।दूसरी ओर डूंगरपुर का देवसोमनाथ मंदिर लगभग 12वीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। यानी यह करीब 800–900 वर्ष पुराना मंदिर है। इसका निर्माण राजा अमृतपाल देव के काल में हुआ बताया जाता है।इस प्रकार ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों दृष्टियों से गुजरात का सोमनाथ मंदिर डूंगरपुर के देव सोमनाथ मंदिर से अधिक प्राचीन माना जाता है, और मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

धार्मिक और पर्यटन महत्व

देवसोमनाथ मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास और अन्य पर्वों पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। सोम नदी के किनारे स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भी परिपूर्ण है, जिससे यहां आने वाले पर्यटक आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर

राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में देवसोमनाथ मंदिर का विशेष स्थान है। यह मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला, धार्मिक आस्था और लोकविश्वासों का जीवंत उदाहरण है। आज भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों को हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति का दिग्दर्शन कराती है। देवसोमनाथ मंदिर वास्तव में वागड़ क्षेत्र की आध्यात्मिक पहचान और राजस्थान की अमूल्य धरोहर है।

दोनों मंदिरों में समानताएं और अंतर

राजस्थान के देवसोमनाथ मंदिर और गुजरात के सोमनाथ मंदिर में कई समानताएं और असमानताएं है। दोनों ही भगवान शिव को समर्पित अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर हैं। दोनों मंदिरों की स्थापत्य शैली में प्राचीन भारतीय नागर शैली की झलक मिलती है। पत्थरों पर की गई सुंदर नक्काशी और ऊँचे शिखर दोनों की विशेषता हैं। यद्यपि दोनों मंदिरों की धार्मिक आस्था और स्थापत्य में कई समानताएं दिखाई देती हैं, फिर भी इनके इतिहास, आकार, भौगोलिक स्थिति और महत्व में कई अंतर भी हैं। देवसोमनाथ मंदिर दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर जिले में सोम नदी के किनारे स्थित है, जबकि सोमनाथ मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र में अरब सागर तट पर प्रभास पाटन में स्थित है। समुद्र तट पर स्थित होने के कारण सोमनाथ मंदिर का दृश्य अत्यंत भव्य है। सोमनाथ मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है, इसलिए इसका राष्ट्रीय और वैश्विक धार्मिक महत्व अधिक है। जबकि देवसोमनाथ मंदिर क्षेत्रीय आस्था का प्रमुख केंद्र है, लेकिन उसे ज्योतिर्लिंग का दर्जा प्राप्त नहीं है। हालाँकि इसके प्राचीन महत्व को देखते हुए एएसआई इस धरोहर का संरक्षण कर रही है।

इतिहास, पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक गौरव

सोमनाथ मंदिर का इतिहास अनेक आक्रमणों और पुनर्निर्माणों से जुड़ा है। विशेष रूप से महमूद गजनवी के आक्रमण का उल्लेख इतिहास में मिलता है। दूसरी ओर देवसोमनाथ मंदिर अपेक्षाकृत शांत इतिहास वाला मंदिर रहा है।देवसोमनाथ मंदिर तीन मंजिला और 108 पत्थर के स्तंभों पर आधारित है, जिसमें चूना या गारा उपयोग नहीं किया गया। सोमनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप विशाल, भव्य और आधुनिक पुनर्निर्माण शैली का उदाहरण है, जिसे चालुक्य शैली में निर्मित किया गया है।

सोमनाथ मंदिर पूरे भारत की धार्मिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है। वहीं देवसोमनाथ मंदिर वागड़ अंचल की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध है।

इस प्रकार दोनों मंदिर भारतीय संस्कृति और शिव भक्ति की महान परंपरा को दर्शाते हैं। एक ओर सोमनाथ मंदिर राष्ट्रीय आस्था का केंद्र है, तो दूसरी ओर देवसोमनाथ मंदिर राजस्थान की प्राचीन स्थापत्य कला और लोक आस्था का अद्भुत प्रतीक एवं केन्द्र है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग के मुख्य न्यायाधीश रहें और डूंगरपुर राजघराने से ताल्लुक रखने वाले स्वर्गीय डॉ नागेन्द्र सिंह कहते थे कि उन्हें देश दुनिया में कई भव्य मंदिरों के दर्शन का सौभाग्य मिला लेकिन उन्होंने देवसोमनाथ मंदिर जैसी अद्भुत स्थापत्य कला कहीं नहीं देखीं ।

Updated on:
21 May 2026 05:35 pm
Published on:
21 May 2026 05:26 pm
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