
आजमगढ़. समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष व आजमगढ़ के सांसद मुलायम सिंह द्वारा एक निजी कार्यक्रम में चुनाव को लेकर दिये गये बयान से जिले की राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। मुलायम सिंह यादव के मैनपुरी से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद यह माना जा रहा है कि आजमगढ़ में सपा को कोई नया योद्धा ढूंढना होगा जो पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। कारण कि यहां 2014 में मुलायम सिंह यादव बड़ी मुश्किल से चुनाव जीते थे।
मुलायम यहां से चुनाव नहीं लड़ते है तो इसकी प्रमुख वजह भी यही होगी। कारण कि उस चुनाव में मुलायम को बड़े अंतर से जिताने के लिए पूरी सरकार और उनका परिवार लगा था। इसके बाद भी हार जीत का अंतर 63 हजार ही पहुंच पाया था। वहीं मुलायम के चुनाव न लड़ने पर भाजपा और बसपा को खुद की राह आसान दिख रही है। कारण कि स्थानीय सपा में इस कद का कोई नेता नहीं है जो भाजपा के बाहुबली रमाकंत का मुकाबला कर सके। वहीं बसपा भी इस बार मुख्तार अंसरी के बेटे पर दाव खेलने का मन बना रही है।
वर्ष 2014 के चुनाव की बात करें तो उस समय आजमगढ़ में दो कैबिनेट, एक राज्य और आधा दर्जन दर्जा प्राप्त मंत्री थे। मुलायम सिंह यादव यहां से चुनाव लड़े तो भाजपा ने उनके खिलाफ रमाकांत यादव और बसपा ने शाहआलम को मैदान में उतारा। मुलायम ने खुद कहा था कि यहां के नेताओं के भरोसे रहता तो चुनाव हार जाता। उस चुनाव में मुलायम का पूरा कुनबा प्रचार के लिए आजमगढ़ में उतरा था तो मंत्रियों की फौज भी उतार दी गयी थी इसके बाद भी 58.4 प्रतिशत पोल मतों में मुलायम सिंह मात्र 340306 मत ही हासिल कर सके थे। यानि उन्हें मात्र 35.44 प्रतिशत मत मिला था। जबकि बीजेपी के रमाकांत यादव ने 277102 यानि 28.86 प्रतिशत मत हासिल किया था। बसपा को 27.76 प्रतिशत यानी 266528 मत मिले थे। मुलायम सिंह ने बीजेपी के रमाकांत यादव को मत्र 63204 मतों से पराजित किया था। बसपा को मिले मतों से साफ है कि उस समय जब सपा सत्ता में थी तब भी उसे मस्लिम मतदाताओं को खुलकर समर्थन नहीं मिला था।
चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह यादव सिर्फ चीनी मिल का उद्घाटन करने आजमगढ़ आये। इस दौरान उनके लापता होने का पोस्टर तक आजमगढ़ में लगा। तभी से यह माना जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से दोबारा चुनाव नहीं लड़ेगें। कारण कि इस बार न तो प्रदेश में उनकी सरकार है और ना ही सपा के पास पुरानी ताकत बची है।
मुलायम सिंह यादव के मैनपुरी से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद सपाइयों की पेशानी पर बल साफ दिख रहा है। कारण कि अगर सबकुछ ठीक रहा था भाजपा से बाहुबली रमाकांत यादव का 2019 में मैदान में उतरना तय है और सपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो रमाकांत का मुकाबला कर सके। पिछले चुनाव में बाहुबली दुर्गा प्रसाद यादव और बलराम यादव टिकट के दावेदार थे। जिलाध्यक्ष हवलदार यादव को टिकट भी मिला था लेकिन चुनाव बाद में मुलायम सिंह यादव लड़े। अब मुलायम के न लड़ने पर ये तीनों लोग फिर टिकट की दावेदारी कर सकते है लेकिन दुर्गा प्रसाद यादव और बलराम यादव को पहले रमाकंत यादव लोकसभा में मात दे चुके है। ऐसे में सपा के किसी मजबूत नेता की तलाश बड़ी चुनौती होगी।
वही मुलायम के न लड़ने पर बसपा को भी मौका दिख रहा है कारण कि पिछले चुनाव में बीजेपी और बसपा के बीच मात्र 1.10 प्रतिशत मतों का अंतर था। जबकि उस चुनाव में शाहआलम पूरी तरह दबाव में थे। ऐसे में माना जा रहा है कि बसपा मुस्लिम और दलित कंबिनेशन को और मजबूत करने के लिए बाहुबली मुख्तार अंसारी के बेटे को मैदान में उतार सकती है जो हाल में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी के फागू चौहान को कड़ी टक्कर दिये थे।