बालोद

किस्सा छत्तीसगढ़ : …वोट के लिए कार्यकर्ताओं के घर बांध देते थे बकरा

रातों-रात वोटर पलटने की चर्चा खूब होती थी। उस दौरान सुविधा संपन्न कांग्रेस, भाजपा के लोग मतदान के ठीक 1 या 2 दिन पूर्व गांव में अपने कार्यकर्ताओं के घर 'बकरा' बांध देते थे, जिसे मतदान के बाद गांव के लोगों को दावत करने की बात कही जाती थी।

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Nov 06, 2018
#cgelection2018
किस्सा छत्तीसगढ़ : ...वोट के लिए कार्यकर्ताओं के घर बांध देते थे बकरा

भिलाई/बालोद. वर्ष 1956 से कांग्रेस का 'गढ़' रहे डौंडीलोहारा विधानसभा क्षेत्र (अजजा) 1980 में अप्रत्याशित ढंग से यह गढ़ ढह गया और 80 से 90 तक यहां छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का कब्जा बना रहा।
राजनीति के जानकार अरमान अश्क ने राजनीति में उलटफेर की पुरानी बातें ताजा करते हुए बताया कि अनुसूचित जन जाति वर्ग के लिए सुरक्षित इस सीट पर डौंडीलोहारा जमीदारी की रानी झमित कुंवर देवी और अविभाजित मध्यप्रदेश के आदिवासी नेता झुमुक लाल भेडिय़ा का वर्चस्व रहा है, परंतु 1980 में कर्मशील मजदूर नेता कामरेड शंकर गुहा नियोगी के इंकलाब जिंदाबाज के नारे ने कांग्रेस के अभेद्य गढ़ को 'ढहा' दिया था, तब जनक लाल ठाकुर यहां से लगातार दो बार विधायक चुने गए।

अविकसित क्षेत्र में श्रमदान से विकास की बात रखी तब बदले विचार
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष गैंद सिंह ठाकुर के अनुसार मोर्चा के हमारे नेता कामरेड नियोगी जी और मोर्चा कार्यकर्ता चुनाव के समय साइकिल से गांव-गांव जाकर छोटी-छोटी बैठकें लेते थे और ग्रामीणों को इस अविकसित क्षेत्र में श्रमदान के माध्यम से विकास कार्य करने की बातें करते थे। कामरेड नियोगी और ग्रामीणों के बीच प्रमुख रूप से सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बांध बनाने व स्वास्थ्य पर अधिक चर्चा होती थी। बेरोजगारी हटाने, नशाबंदी तथा गांव में एकता पर उनका विशेष ध्यान रहता था। उनकी बातें सुन कर ग्रामीण उनके पक्षधर होते गए।

कांग्रेस-भाजपा के लोग लालच देते, तो मोर्चा के कार्यकर्ता करते थे विरोध
उन्होंने कहा कि रातों-रात वोटर पलटने की चर्चा खूब होती थी। उस दौरान सुविधा संपन्न कांग्रेस, भाजपा के लोग मतदान के ठीक 1 या 2 दिन पूर्व गांव में अपने कार्यकर्ताओं के घर 'बकरा' बांध देते थे, जिसे मतदान के बाद गांव के लोगों को दावत करने की बात कही जाती थी। इसी लालच में एक तरफ वोट लेने की बातें होती थी। हमारे मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने ऐसे कार्यों का विरोध भी करते थे। चुनाव प्रचार के दौरान जंगल क्षेत्र में रातोंं-रात वोट पलटने का यही माध्यम हुआ करता था। परंतु अब लोग जागरूक हो गए हैं अपने मताधिकार का उपयोग सोच समझकर करते हैं ।

प्रचार के दौरान चावल-दाल लेकर चलते थे कार्यकर्ता
मुक्ति मोर्चा के सक्रिय कार्यकर्ता नवाब जिलानी ने बताया कि वर्ष १९80 के विधानसभा चुनाव प्रचार कार्य में हमारे साथी अलग-अलग टोली बनाकर साइकिल से गांव-गांव जाकर ग्रामीणों से मिलते थे। इस दौरान अपने साथ चावल, दाल भी रखते थे। जहां रात में गांव में बैठकें लेकर भोजन के बाद गांव में विश्राम भी करते थे।

Published on:
06 Nov 2018 11:29 pm