बलरामपुर

दोनों आंखों की नहीं है रोशनी, पर उदय की कहानी सुनकर आप भी हो जाएंगे मुरीद

कहते हैं न, दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो जीवन में कितनी भी बाधाएं व तकलीफ क्यों न आए, इन सबसे इंसान पार पा लेता है।

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दोनों आंखों की नहीं है रोशनी, पर उदय की कहानी सुनकर आप भी हो जाएंगे मुरीद

बलरामपुर/राजपुर. कहते हैं न, दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो जीवन में कितनी भी बाधाएं व तकलीफ क्यों न आए, इन सबसे इंसान पार पा लेता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है दोनों आंखों से दिव्यांग युवक उदय ने। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के राजपुर ब्लॉक स्थित ग्राम भेंदो भदार का रहने वाला उदय पैंकरा न केवल 12 वर्षों से गरीबी से लड़ रहा है बल्कि अपनी मेहनत के दम पर 3 बहनों की शादी भी कर डाली और 2 छोटी बहनों को स्कूल में तालीम भी दिलवा रहा है। उसने आंखों की दिव्यांगता के आगे कभी हार नहीं मानी। हाथों में बांसुरी लिए गांव-गांव में फिल्मी व भोजपुरी गीत सुनाकर लोगों से मिले 5-10 रुपए को जमा कर पूरे परिवार को चला रहा है। जबकि घर की माली हालत खराब होने पर पत्नी भी शादी के 3 साल बाद उसे छोड़कर चली गई थी।

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बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के चांदो क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बेंदो भदार निवासी 26 वर्षीय उदय पैकरा पिता सपरु पैंकरा दोनों आंखों से दिव्यांग है। वह घर का बड़ा बेटा है और ५ बहनें संगरिता, मंगरिता, बलवंती, प्रेमनी व जशपतिया हैं। उसकी शादी 16 साल पहले 2001 में गांव की ही एक लड़की सुगु पैंकरा से हुई थी लेकिन घर की माली हालत इतनी खराब थी कि शादी के तीन साल बाद ही पत्नी उसे छोड़कर चली गई। इसके बाद भी उदय ने हिम्मत नहीं हारी, घर की माली हालत इतनी खराब थी कि उसने अपनी दिव्यांगता को पीछे छोड़ बड़े बेटे होने का फर्ज निभाया। कहीं से बांसुरी बजाने की कला सीखी फिर पिछले 12 वर्ष से बांसुरी लिए चांदो, बलरामपुर, राजपुर, शंकरगढ़, डीपाडीह, कुसमी, अस्ता, मनोरा, जशपुर, कुसमी, महुआडांड़, शंकरगढ़, राजपुर में घूमकर लोगों को बांसुरी की धुन पर छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, नागपुरी व फिल्मी गीत सुनाकर बदले में मिले रुपयों से पूरे परिवार का जीवन यापन कर रहा है।

हर माह कमा लेता है 4 से 5 हजार रुपए
उदय ने बताया कि घर कि आर्थिक स्थिति काफी खराब है। वो बांसुरी बजाकर व गीत सुनाकर परिवार का जीवन-यापन कर रहा है। उसने बताया कि लोगों से मिलने वाले 2, 5 व 10 रुपए को जमा कर प्रतिमाह 4 से 5 हजार रुपए कमा लेता है। उसने अपनी कमाई से तीन बहनें संगरिया, मंगरिता व बलवंती की शादी कर दी है। इसके साथ ही कुछ पैसा बचा कर घर की मरम्मत कराई और अपने पिता को खेतों में जुताई के लिए दो नग बैल खरीद कर दिया। वो दिन भर गांवों में घूमकर बांसुरी बजाकर लोगों को गीत सुनाता है फिर शाम को बस स्टैंड पहुंचकर होटल में खाना खाकर यात्री प्रतीक्षालय में सो जाता है। उसे छत्तीसगढ़ी, नागुपरी, फिल्मी व भोजपुरी मिलाकर लगभ 500 गाने याद हैं। उसने बताया कि अभी दो छोटी बहनों को पढ़ा रहा हूं और आगे चलकर उनकी शादी करनी है।

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Published on:
12 Aug 2017 10:05 pm
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