
बेंगलूरु. निजी भू सर्वेक्षकों को भुगतान नहीं मिलने से भू सर्वेक्षण संबंधी आवेदनों का अंबार लगता जा रहा है। सर्वेक्षण नहीं होने से किसान परेशान हो रहे हैं।
भू सर्वेक्षण विभाग में सर्वेक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं होने के कारण राÓय सरकार ने निजी क्षेत्र के मान्यता प्राप्त सर्वेक्षकों की सेवाएं लेने का फैसला किया था। लेकिन उनका सेवा शुल्क तय नहीं किए जाने से राजस्व विभाग तथा सर्वेक्षकों के बीच विवाद खड़ा हो गया। भुगतान को लेकर स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण सर्वेक्षक आवेदनों का निपटारा नहीं कर रहे हैं। भूमापन विभाग में सीमित सर्वेयर होने से लंबित आवेदन बढ़ते जा रहे हैं।
सर्वेक्षण आवेदनों का लगा अंबार
राÓय में भूमि सर्वेक्षण के 6 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। कृषि भूमि का सर्वेक्षण नहीं होने से किसानों के ऋण आवेदन, परिवार में कृषि भूमि का बंटवारा, कृषि भूमि की खरीद-बिक्री तथा कृषि भूमि के परिवर्तन पर अघोषित रोक लगी हुई है।
आठ वर्ष से भुगतान नहीं
निजी क्षेत्र के सर्वेक्षकों का कहना है कि वर्ष 201& से उन्हें भुगतान नहीं किया गया है। राÓय में मान्यता प्राप्त सर्वेक्षकों की संख्या 2 हजार से अधिक है। ऐसे सर्वेक्षक भूमापन विभाग के सरकारी सर्वेक्षकों के साथ सहायक के रुप में कार्य कर रहे है। राजस्व विभाग किसानों से कृषि भूमि सर्वेक्षण आवेदन के साथ 12 सौ से 5 हजार रुपए तक सेवा शुल्क वसूलता है। निजी सर्वेयर चाहते है कि यह सेवा शुल्क उन्हें मिले।
एक माह से रोका सर्वेक्षण का कार्य
निजी सर्वेक्षकों ने भुगतान की मांग को लेकर पिछले एक माह से कृषि भूमि के सर्वेक्षण का काम रोक दिया है। राजस्व विभाग का कहना है कि लंबित आवेदनों की संख्या 2 लाख से अधिक नहीं है। लेकिन राÓय में इस मामले को लेकर किसानों की शिकायतें बढ़ रही हैं। मान्यता प्राप्त भू सर्वेक्षक संघ का दावा है कि राÓय सरकार उनकी सेवाएं स्थाई नहीं कर रही है। सेवा शुल्क का भुगतान भी नहीं कर रही है। सर्वेक्षकों को जीवनयापन करना मुश्किल हो रहा है।
विधान परिषद में भी गूंजा था मामला
बजट सत्र के दौरान विधान परिषद में राजस्व मंत्री अशोक ने कहा था कि समस्या का समाधान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। तो परिषद के कई सदस्यों ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राÓय सरकार पर इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेने का आरोप लगाया था।