
बेंगलूरु. तेरापंथ महिला मंडल यशवंतपुर के तत्वावधान में मुनि रणजीत कुमार एवं मुनि रमेश कुमार के सानिध्य में सम्यक गोचरी विधि विषय पर कार्यशाला तेरापंथ भवन में संपन्न हुई। मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि गोचरी जैन मुनि की चर्या का एक अंग है। जैन मुनि भिक्षा के लिए घरों में जाते हैं और सहज निष्पन्न भोजन को ग्रहण करते हैं उसे गोचरी कहा जाता है। उस घर का खाना-पीना शुद्ध हो, जैन होना जरूरी नहीं है। मुनि रमेश कुमार ने कहा कि गोचरी, भिक्षाचरी, भ्रामरीवृत्ति, ये जैन मुनि की भिक्षा से संबंधित है। जैन मुनि बयालिस दोष टालकर भिक्षा ग्रहण करते हैं। इस मौके पर पूर्व मंडल अध्यक्ष निर्मला गादिया, अध्यक्ष अरुणा महनोत सहित करीब 50 महिलाएं मौजूद थीं। संचालन मंत्री मीनाक्षी दक ने किया।
धर्म स्थान भी संसद भवन बन गए हैं
मैसूरु. स्थानकवासी जैन संघ के स्थानक भवन में डॉ. समकित मुनि ने कहा कि अपनी प्रज्ञा से धर्म की समीक्षा करो। धर्म को बांटने का कार्य मत करो। समाज में दुर्योधन मन बनो। युधिष्ठिर बनने की कोशिश करो। धर्म स्थान भी संसद भवन बन गए हैं। संसद ने देश का बंटाधार कर दिया है तथा हम भी स्थानक भवन में बैठकर यही सब तो नहीं कर रहे हैं।
जो संघ में फूट डालता है वह महामोहनीय कर्म का बंध कर लेता है। संतों को अनुकम्पा भाव से दान नहीं वरन अहोभाव से दान देना है। इस दुनिया का सबसे बड़ा बेटा 'मान' है। करोड़ों की सम्पत्ति छोड़कर संन्यास लेना आसान है। पर संन्यास लेकर अभिमान को छोडऩा बहुत मुश्किल है। सभा में मदनलाल गन्ना, सुभाष धोका, लालचंद लुंकड़, राजेंद्र भंसाली, आनंद पटवा, हरीश दरला, राजेंद्र देसरला आदि उपस्थित थे। अध्यक्ष कैलाशचंद जैन ने स्वागत किया।
महापुरुष नहीं उलझते मोह माया में
विजयनगर स्थानक में विराजित साध्वी ऋजुता ने कहा कि आसक्ति एक मूच्र्छाभाव है।यह आसक्ति जीव का संसार अनंत कर देती है परंतु जब यह आसक्ति छूट जाती है तो वह उस अनंत को भी पार कर लेता है। भगवान कहते हैं अनेक महापुरुष इस संसार में रहते हुए भी इस मोह माया में नहीं उलझते। ऐसे व्यक्ति ही संत का जीवन यापन करके अपने आप को संत कहला सकते हैं। गृहस्थ वही कहे जाते हैं जो इस मोह माया में उलझे हैं इस भौतिक एश्वर्य में फंसे हैं। भौतिक संसाधनों में सुख खोजते हैं, वह गृहस्थ होते हैं। दिल्ली से आए भारत भूषण ने स्तवन प्रस्तुत कर श्रद्धा भक्ति प्रदर्शित की।