
बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक संघ शांतिनगर में आचार्य महेंद्र सागर सूरी ने कहा कि हमारे पास यह शरीर है और उसके भीतर उसका संचालन करती आत्मा है। शरीर के भीतर ही काम वासना भी है। काम वासना दूसरे शरीर की इच्छा करती है क्योंकि इसकी पूर्ति के लिए दूसरा शरीर अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि शरीर से शरीर के मिलन को काम कहा जाता है। उससे ऊपर प्रेम है। वहां शरीर की इच्छा नहीं होती क्योंकि वहां शरीर से संबंध नहीं होता अपितु मन से संबंध रहता है।
दो शरीर का मिलन काम है तो दो मन का मिलन प्रेम है। जब मनुष्य की अधोवाहिनी होती है तब उसके जीवन का प्रवाह नीचे की ओर बहता है मोह की ओर बहता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य शरीर या इन्द्रिय भोग सुख तक ही सिमट कर रह जाता है और मनुष्य जीवन के लक्ष्य से भटक जाता है। जब ऊर्जा की शक्ति का प्रवाह अन्तर्मुख हो जाता है तब वह बाहर की ओर न बहकर भीतर की ओर बहता है। तप संयम की ओर बहता है। त्याग वैराग्य की ओर बहता है। यह ऊर्जा की शक्ति का उध्र्वीकरण है। शरीर को शरीर चाहिए, मन को मन चाहिए तो आत्मा को आत्मा-परमात्मा चाहिए। शरीर स्थूल है, मन सूक्ष्म है तो आत्मा अदृश्य है।
पुण्य कर्म के उपार्जन से लोकप्रिय बने पार्श्ववनाथ
सीमंधर शांति सूरी जैन ट्रस्ट वीवीपुरम के तत्वावधान में आचार्य चंद्रभूषण सूरीश्वर ने पार्श्वनाथ भगवान का प्रभाव बताते हुए कहा कि पार्श्वनार्थ प्रभु ने पूर्व के भव में देव आयुष्य में 500 तीर्थंकरों के जन्माभिषेक अग्रिम अग्रणी बनकर मनाए। उन्होंने कहा कि पाŸवनार्थ प्रभु तीर्थंकर के भव में सभी जगह आदेय नाम कर्म के धारक बनें। उसी पुण्य कर्म के उपार्जन से वे अन्य तीर्थंकरों से ज्यादा लोकप्रिय एवं लोकग्राह्य बनें।
भारत भर में उनके नाम के तीर्थ ज्यादा हैं। उनके यंत्र जाप ज्यादा हैं। उनके भक्त ज्यादा हंै। जिन शासन के जन जन ने हृदय में बसाया। यह सब पुण्य तीर्थंकर की भक्ति के उपार्जित हुआ है। प्रभु पाŸव के अधिष्ठायक देव अत्यंत जागृत है। सामान्य अ_म तप जप करने से वे तुंरत ही कामना पारपूर्ण करते हैं।