बैंगलोर

गगनयान मिशन पर भी पड़ेगा पीएसएलवी विफलता का असर!

अब गगनयान-1 की लांचिंग में हो सकता है विलंब

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Jan 16, 2026

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को पीएसएलवी सी-62 के प्रक्षेपण में मिली विफलता का असर देश के महात्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान पर भी पड़ेगा। इसरो की योजना अगले महीने पहला गगनयान-1 मिशन लांच करने की थी, लेकिन अब संभवत: यह नहीं हो पाएगा।

गगनयान मिशन की समय सीमा लगातार बदलती रही है, लेकिन तीन मानव रहित मिशनों में से पहला मानव रहित मिशन (एचएलवीएम 3 जी-1) 10 फरवरी को लांच करने की योजना के साथ तैयारियां चल रही थीं। तीन मानव रहित मिशनों के बाद मानव अंतरिक्ष मिशन वर्ष 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत में लांच करने का लक्ष्य था। इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक अब गगनयान-1 मिशन में ही विलंब होगा, जिससे पूरी परियोजना की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।

सूत्रों का कहना है कि गगनयान-1 मिशन लांच करने के बाद उसकी ट्रैकिंग के लिए हवाई द्वीप स्थित एक जमीनी केंद्र सपोर्ट के लिए अनुरोध भेजा गया था। इसमें 9 फरवरी से लेकर 30 दिनों की अवधि के लिए सपोर्ट का अनुरोध किया गया था। दरअसल, कोई भी मिशन लांच करने के बाद भारत समेत विश्व के कई देशों में स्थित जमीनी स्टेशनों से उसकी ट्रैकिंग की जाती है। गगनयान-1 मिशन के लिए भी सामान्य प्रक्रियाओं के अनुरूप तैयारियां चल रहीं थीं और जमीनी केंद्रों को अलर्ट किया गया था। इस बीच पीएसएलवी सी-62 मिशन की विफलता के बाद हवाई द्वीप को भेजा गया अनुरोध कथित तौर पर वापस ले लिया गया है। इसका अर्थ है कि मिशन में अब विलंब होगा। पहले गगनयान-1 मिशन वर्ष 2025 के अंत तक ही लांच किया जाना था, जिसे आगे बढ़ाकर मार्च 2026 तक लांच करने का लक्ष्य रखा गया।

कई बार बदली गई समय-सीमा

दरअसल, इस मिशन की समय-सीमा कई बार बदली गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मिशन की घोषणा 2018 में की थी। उस समय तय किया गया था कि यह मिशन 2021 में लांच होगा। उसके बाद कोरोना माहामारी के कारण आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई और तमाम मिशनों में विलंब हुआ। गगनयान मिशन की समय सीमा 2024 कर दी गई, लेकिन अब मिशन की समय सीमा 2027-2028 हो चुकी है। मानव मिशन भेजने से पहले इसरो को तीन मानव रहित मिशन लांच करने हैं। पहले ही मानव रहित मिशन में हो रहा विलंब आगे के मिशनों को प्रभावित करेगा। हालांकि, इसरो अध्यक्ष वी नारायणन ने दावा किया है कि मिशन के लिए लगभग 85 फीसदी तकनीकों का विकास किया जा चुका है, फिर भी अब कई अहम तकनीकों का परीक्षण बाकी है।

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