
बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोडवाड़ भवन में उपाध्याय रविंद्र मुनि के सान्निध्य में रमणीक मुनि ने 'जिंदगी की असली चुनौतियां' विषय पर प्रवचन में कहा कि धर्म साधना करते-करते इतने वर्षों के बाद भी व्यक्ति उस योग्यता को प्राप्त नहीं कर पाया है जिस आधार पर व्यक्ति की आध्यात्मिकता चिन्हित होती है।
उन्होंने कहा कि खुद को खुद से ही देखने पर खुद का ज्ञान होगा। जो भी धर्म की आराधना, स्वाध्याय, सामायिक आदि धर्म के निमित्त कुछ भी किया जाता है उसका लक्ष्य, उद्देश्य निश्चित कर लेना चाहिए। दुनिया की चीजें पाने के लिए धर्म करने से संसार से मुक्ति नहीं मिलेगी, संसार से मुक्ति तो अपने आप को और अपने आत्म स्वरूप को जानने से होगी।
इसके बिना सिद्ध के स्वरूप को नहीं पाया जा सकता। दुनिया के किसी पदार्थ या वस्तु में सुख नहीं है। मन दुखी है तो व्यक्ति सुख के कितने भी साधन हो उन का उपयोग नहीं कर सकता है। बड़ा बनाने वाला बड़ा होता है, छोटा समझने वाला बड़ा नहीं होता। प्रारंभ में उपाध्याय रविंद्र मुनि ने मंगलाचरण किया। ऋषि मुनि ने गीतिका सुनाई। पारस मुनि ने मांगलिक प्रदान की।
महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने बताया कि चौमुखी जाप के लाभार्थी ताराचंद सज्जन बाई भिलवादिया का जैन दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मान किया। सभा मे आध्यात्मिक चातुर्मास के मुख्य संयोजक रणजीतमल क़ानूगा, महावीर मूथा, जैन कांफ्रेंस महिला शाखा की प्रदेशाध्यक्ष संतोष बोहरा सहित दिल्ली, पुणे, पंजाब व शहर के विभिन्न उपनगरीय संघो से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। वडग़ांवशेरी के संघ के पदाधिकारियों ने रमणीक मुनि से वर्ष 2019 के चातुर्मास की विनती की।
संस्कार संरक्षण के लिए धार्मिक हो परिवार
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के महावीर भवन में जैनाचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने 'सिंदूर प्रकरण' ग्रंथ पर प्रवचन में कहा कि मानवीय मन पर निमित्त का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। शुभ अशुभ निमित्त के संपर्क के ही अपनी विचारधारा में जबरदस्त परिवर्तन आ जाता है। बाह्य-निमित्त को पाकर ही हमारी आत्मा में सोए हुए संस्कार जागृत बनते हैं। यदि हम आत्मा में रहे शुभ संस्कारों को जागृत करना चाहते हैं तो हमें शुभ वातावरण में रहना चाहिए। आत्मा में घर कर गए अशुभ संस्कारों को हटाना है तो अशुभ वातावरण से सदा सर्वथा दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे संस्कारों के सिंचन के लिए, उनके संरक्षण के लिए सानुकूल धार्मिक परिवार का होना बहुत जरूरी है।