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डिग्री पाने से कोई ज्ञानी नहीं होता, ज्ञान को आचरण में लाना महत्त्वपूर्ण

ह बात जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में महावीर धर्मशाला में जयधुरंधर मुनि ने कही
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डिग्री पाने से कोई ज्ञानी नहीं होता, ज्ञान को आचरण में लाना महत्त्वपूर्ण

बेंगलूरु. व्यक्ति ज्ञान के अभाव में पशु समान होता है। सम्यग ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। ज्ञान से ही गुण-दोष, सार-असार, सत्य-असत्य, नीति-अनीति, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, जीव-अजीव, हित-अहित आदि का बोध होता है। यह बात जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में महावीर धर्मशाला में जयधुरंधर मुनि ने कही। उन्होंने कहा कि सम्यक ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है।

ज्ञान से ही गुण-दोष, सार-असार, ग्राह्य-अग्राह्य, सत्य-असत्य, नीति-अनीति, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, जीव-अजीव, हित-अहित आदि का बोध होता है। एक सद्गृहस्थ को धर्म, नीति एवं सिद्धांतों का विशेष ज्ञान होना चाहिए। श्रावक के लिए तत्वों का ज्ञान होना आवश्यक है। विशेष जानकार व्यक्ति को संबंधित विषय पर गहन चिंतन एवं मनन करना चाहिए। मात्र डिग्री पाने से ही कोई ज्ञानी नहीं बनता। योग्यता के साथ सीखे हुए ज्ञान को आचरण में लाना अधिक महत्त्वपूर्ण है। धर्मसभा का संचालन रविंद्र चोरडिय़ा ने किया। मध्यान्ह 2.30 से 3.30 बजे तक महिला तत्त्वज्ञान शिविर हुआ, जिसमें 60 से अधिक महिलाओं ने शिरकत की।

सुख का मार्ग है धर्म
हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुप्रिया ने गुरुवार को प्रवचन में कहा कि धर्म को सच्चा साथी बना लें वही आपके साथ अंत तक जाएगा। सच्चे सुख का मार्ग धर्म है। धर्म ही मानव का सच्चा साथ निभाता है। संकट हो या अनुकूल-प्रतिकूल कैसी भी परिस्थिति हो धर्म हमेशा आत्मा में बसा रहता है। धर्म उत्कृष्ट मंगल है। जो अहिंसा, संयम, तप रुपी धर्म का उत्कृष्ट पालन करता है उसे साक्षात देवता भी नमस्कार करते हैं। जिसके हृदय में धर्म का वास हो वही महान पुण्य आत्मा है। जो धारण किया जाता है वही धर्म हुआ करता है। जीवन में बिना धर्म के इंसान की शोभ नहीं है।

धर्म के बिना धर्म भी व्यर्थ है। धन से केवल इहलोक में सुख पाया जा सकता है। पर धर्म दोनों लोकों को सुखी बनाता है। धर्मवान व्यक्ति ही अरिहंत, जिन, परम सिद्ध को प्राप्त कर सकते हैं। प्रारंभ में साध्वी सुविधि ने गीतिका प्रस्तुत की। साध्वी सुमित्रा ने सागरदत्त चरित्र के वाचन के साथ सबको मंगलपाठ दिया। संघ अध्यक्ष हुकमीचंद कांकरिया के 35 उपवास की तपस्या मौन के साथ गतिमान है। मंत्री महावीरचंद धारीवाल ने स्वागत किया। संचालन संजय कुमार कचोलिया ने किया।