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येड्डियूरप्पा को मिला आलाकमान का साथ, अभी नहीं होगा बदलाव

प्रदेश भाजपा: लोस चुनाव से पहले पार्टी जोखिम लेने के पक्ष में नहीं

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येड्डियूरप्पा को मिला आलाकमान का साथ, अभी नहीं होगा बदलाव

बेंगलूरु. लोकसभा और विधान सभा की पांच सीटों के उपचुनाव में करारी शिकस्त के बाद प्रदेश नेतृत्व में उठ रही बदलाव की मांग के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष बी एस येड्डियूरप्पा को भाजपा आलाकमान से अभयदान मिल गया है।

येड्डियूरप्पा अगले साल अप्रेल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव तक अध्यक्ष बने रहेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि प्रदेश नेताओं का एक बड़ा समूह येड्डियूरप्पा को उपचुनावों में हार के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए प्रदेश नेतृत्व में परिवर्तन की मांग कर रहा है लेकिन आलाकमान आम चुनाव से सिर्फ कुछ महीने पहले येड्डियूरप्पा को हटाकर किसी तरह का राजनीतिक जोखिम लेने के पक्ष में नहीं है।

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भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अभी पार्टी के पास येड्डियूरप्पा के जैसा कोई दूसरा लोकप्रिय व मजबूत संगठन कौशल वाला नेता नहीं है।

वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि जातिगत समीकरणों के लिहाज से भी येड्डियूरप्पा आम चुनाव में भाजपा के लिए बेहतर विकल्प साबित होंगे।

येड्डियूरप्पा के करीबी एक सांसद ने कहा कि जो लोग पांच सीटों के उपचुनाव में हार का ठीकरा येड्डियूरप्पा पर फोडऩे की कोशिश कर रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि कुछ महीने पहले हुए चुनाव में येड्डियूरप्पा के नेतृत्व में पार्टी को 104 सीटें मिलीं थी।

येड्डियूरप्पा सिर्फ लिंगायत नेता ही नहीं है, वे किसानों के बीच भी लोकप्रिय हैं और सभी वर्गों में स्वीकार्य हैं। हालांकि, रामनगर विधानसभा उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार के मतदान से पहले पाला बदलकर कांग्रेस में चले जाने के कारण येड्डियूरप्पा को आलाकमान की नाराजगी झेलनी पड़ी लेकिन सूत्रों का कहना है कि येड्डियूरप्पा अब भी वरिष्ठ नेताओं की पसंद बने हुए हैं।

हालांकि, इसके पीछे एक बड़ा कारण विकल्प का अभाव है। येड्डियूरप्पा समर्थक एक अन्य नेता ने कहा कि उनके राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए पिछले 2013 के विधानसभा चुनाव में कर्नाटक जनता पक्ष के प्रदर्शन को देखना चाहिए।

सिर्फ एक व्यक्ति के सहारे पार्टी ने 10 फीसदी मत हासिल किए थे। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा येड्डियूरप्पा को वापस लाई थी और पार्टी को उसका फायदा भी मिला था।

पार्टी के एक अन्य नेता ने कहा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस और जद-एस गठबंधन का सामना करना है और ऐसे में येड्डियूरप्पा को हटाकर एक वर्ग की नाराजगी का जोखिम नहीं लिया जा सकता है।

हालांकि, इससे पार्टी में आंतरिक गुटबाजी की समस्या बढ़ सकती है। येड्डियूरप्पा के करीबी एक अन्य नेता ने कहा कि उनके बिना प्रदेश में पार्टी की स्थिति तीर के बिना धनुष समान होगी।

उधर, येड्डियूरप्पा विरोधी खेमे के एक नेता ने कहा कि पार्टी उनपर ज्यादा निर्भर हो गया और दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार नहीं होने दिया गया जिसके कारण आज पार्टी के पास प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

उक्त नेता ने कहा कि राज्य में पार्टी का जनाधार मुख्यत: लिंगायत समुदाय से है लेकिन इस समुदाय से भी दूसरी पंक्ति का कोई नेता नहीं है जो सर्वमान्य ेचेहरा हो।

पार्टी में येड्डियूरप्पा के विकल्प के तौर पर जिन नेताओं के नाम चर्चा में उनमें से अधिकांश वोक्कालिगा, ब्राह्मण अथवा पिछड़े वर्ग हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जद-एस और कांग्रेस गठजोड़ का मुकाबला करने के लिए लिंगायत समुदाय के किसी नेता को ही येड्डियूरप्पा के विकल्प के तौर पर लाना होगा।

जद-एस का जनाधार मुख्यत: वोक्कालिगा समुदाय में है और कांग्रेस की भी इस वोक्कालिगा बहुल क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है।

पार्टी के एक नेता ने कहा कि श्रीरामुलू को आगे बढ़ाने की कोशिश बल्लारी लोकसभा उपचुनाव में पार्टी को उलटी पड़ी और लिंगायत मतदाताओं की बेरुखी के कारण पार्टी को 14 साल बाद यह सीट गंवानी पड़ी।

इस बारे में पूछे जाने पर प्रदेश प्रवक्ता सी टी रवि ने कहा कि भाजपा में पदाधिकारियों का कार्यकाल स्थायी नहीं होता है। आवश्यकता के हिसाब से संगठन में बदलाव होता है।

जब आलाकमान को लगेगा कि प्रदेश में परिवर्तन होना चाहिए तो इस बारे में संसदीय बोर्ड निर्णय लेगा। उधर, प्रदेश महासचिव शोभा करंदलाजे ने शुक्रवार को येड्डियूरप्पा को हटाने की चर्चाओं को खारिज करते हुए कहा कि पार्टी के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है।

शोभा ने कहा कि विरोधी ऐसे बातों को बेवजह फैला रहे हैं ताकि पार्टी के कार्यकर्ता असमंजस में रहें।

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Published on:
17 Nov 2018 06:48 pm
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