रमजान के पवित्र महीने को लेकर मस्जिदों और घरों में खास रौनक दिखाई देती है। रोजा, तरावीह, जकात और इबादतों के जरिए भाईचारा व सहनशीलता का संदेश दिया जाता है। रोजेदार भूख-प्यास सहकर दुआएं मांगते हैं और लैलतुल क़द्र की रात विशेष इबादत के साथ मनाई जाती है।
बांसवाड़ा। इस्लामी (हिज्री) कलेण्डर का नवमां महीना रमजान कहलाता है। रमजान माह दुनिया के तमाम लोगों के लिए रहमत व बरकत का होता है। रमजान में रोजे का अहतमाम किया जाता है। रोजा, जो इंसान की आत्मा को पवित्र बनाने के साथ ही कई जिस्मानी बीमारियों व बुराइयों से भी बचाता है।
रमजान के पाक मौके पर मस्जिदों को रोशनी से सजाया जाता है। घरों पर भी रोशनी की जाती है। साथ ही इबादतें की जाती है और तिलावते कलाम-ए-पाक की जाती है, जिसमें मर्द, औरत, बूढ़े-बच्चे तमाम हिस्सा लेते हैं।
रमजान में जकात व फितरा भी गरीबों को दिया जाता है। अपनी सम्पत्ति का टैक्स सालभर में एक बार अदा करना होता है, वह भी गरीब, मोहताजों को दिया जाता है, जिससे ये लोग भी ईद की खुशियां मना सके। रोजा अमूमन 14 या 16 घंटे का होता है और यह खाना-पानी से ही नहीं, बल्कि दीगर बुराइयों से भी बचाता है। रोजे से भाईचारा और सहनशीलता बढ़ती है। रमजान में इबादतों का सिलसिला आम दिनों से ज्यादा हो जाता है।
रमजान का 27वां रोजा लैयलतुल क़द्र कहलाता है। कहा जाता है कि इसी दिन आसमान से कुरआन को उतारा गया था। इस रात की इबादत हजार महीनों की इबादत के बराबर है। इसीलिए रोजेदार रातभर इबादत करते हैं।
रमजान की पहली तारीख से नमाजे तरावीह पढ़ी जाती है, जिसमें हाफिजे कुरआन जुबानी कुरआन सुनाता है और ये 27वें रमजान को पूरा होता है, जिसे लैयलतुल क़द्र कहते हैं। रोजेदार नमाजी इस रात अपने गुनाहों की अल्लाह से माफी मांगते हैं। अपने पूर्वजों के लिए भी मगाफिरत की दुआ मांगते हैं और अपनी बस्ती, अपने मुल्क और तमाम दुनिया में अमन व भाईचारे की दुआएं मांगते हैं।
रमजान माह को लेकर बांसवाड़ा की तमाम मस्जिदों को खूब सजाया जाता है और नमाज के साथ-साथ तरावीह पढ़ी जाती है। रमजान दुआएं कुबूल होने का महीना है। रोजेदार दिनभर भूख-प्यास सहकर दुआएं मांगता है, तो अल्लाह उसकी दुआएं जल्द कुबूल करता है। इन इबादतों के साथ रमजान पूरा होता है और आखिर में ईद खुशियों के साथ मनाई जाती है।