
बांसवाड़ा
रक्षाबंधन का पर्व जिसका हर भाई-बहन को इंतजार होता है। लेकिन, यह पर्व जनजाति अंचल बांसवाड़ा में निवासरत की एक बहन के लिए खुशी और गम का अनूठा संगम लेकर आता है। उसे भी अन्य बहनों की तहर पर्व का इंतजार होता है। लेकिन, उसे मनाने को लेकर उसकी आंखें झलक उठतीं हैं। रक्षा बंधन के अवसर पर रविवार को भाई-बहन के इस महा-पर्व की एक तस्वीर एेसी भी सामने आई, जो द्रवित करने वाली है। शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर माही-बेक वाटर के आला बरोडा गांव निवासी 8 वर्षीय राजू निनामा जन्म से ही दिव्यांग है। उसके दोनों हाथ नहीं हैं। इस पर रक्षाबंधन का यह पर्व उसकी 12 वर्षीय बहन शकुन्तला के लिए काफी अलग है। आमदिनों में दोनों साथ खेलते-कूदते हैं, लेकिन रक्षा बंधन निकट आते ही भाई की कलाई नहीं होने और रक्षा सूत्र बांधन को लेकर वह मन ही मन रो पड़ती है। उसकी भावनाएं अन्य बहनों की भांति ही उमड़ती हैं, लेकिन भाई की कलाई नहीं होने के दर्द के बीच वह उसके पैरों पर रक्षा सूत्र बांध यह पर्व मनाती आ रही है।
इस बहन के लिए धर्म व जात-पात नहीं रखते मायने
बांसवाड़ा शहर के हाउसिंग बोर्ड निवासी मुस्लिम महिला शरीफा 50 वर्ष से रक्षाबंधन का पर्व मना रही हैं। उन्होंने बताया कि सन 1968 में माहीबांध पर निर्माण कार्य के दौरान वहां कार्यरत राजेन्द्र कुमार शर्मा को उन्होंंने पहली बार रक्षा सूत्र बांध भाई बनाया। यहां से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है। यद्यपि 2001 में बीमारी के चलते भाई की मृत्यु हो गई, लेकिन आज भी रक्षाबंधन पर हाउसिंग बोर्ड में स्थित उनके घर पहुंच भाई की तस्वीर पर तिलक व रक्षासूत्र बांधने का क्रम बना हुआ है। उन्होंने बताया कि धर्म कभी इस रिश्ते के आडे नहीं आया। आज भाई नहीं रहा, लेकिन उनके परिवार के बीच वही सम्मान मिलता है। वह कहती हैं कि जब तक जिन्दगानी है तब तक यह स्नेह की डोर चलती रहेगी।