
कवाई. उपतहसील क्षेत्र के प्राचीन ग्राम कुण्डी जिसे अतीत में कुंडिनपुर के नाम से भी जाना जाता था। यहां से जुड़ी पुरानी के कई गाथाएं आज भी कही-सुनी जाती है। इस गांव में पौराणिक समय की कई बावडिय़ा मौजूद हैं जो इसके समृद्ध इतिहास को बयां करती है। गांव के आसपास आज भी कई ऐसे अवशेष है जो पौराणिक गाथाओं की सच्चाई को बयान करते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उप तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम कुंडी के समीप खेतों के बीच वीराने में स्थित श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी के भवन के शानदार मण्डप के अवशेष हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार विदर्भ के कुंडिनपुर के प्रतापी नरेश भीष्मक की कन्या रुक्मिणी कृष्ण को पति के रूप में वरण की इच्छुक थी। माता-पिता की सहमति के बावजूद भाई रुक्मी नें कृष्ण के प्रति द्वेषवश रुक्मिणी का विवाह कृष्णद्रोही शिशुपाल से तय कर दिया था। रुक्मिणी ने पत्र पहुचा कर कृष्ण से अनुरोध किया था कि जब वह माता पूजन के लिए जावे तब कृष्ण उसका अपहरण कर लें। मान्यता है की कुण्डी ही कुण्डिनपुर है। यहां से करीब 10 किमी दूर स्थित मुसेन माताजी के मंदिर से ही रुक्मिणी का हरण हुआ था। फलस्वरूप भीषण युद्ध हुआ। रूक्मिणी के भाई रुक्मी को श्रीकृष्ण ने कैद कर लिया गया। इन्हें बलराम ने यह कह कर मुक्त कराया कि ये अब अपना सम्बंधी है। कुंडी गांव में आज भी 7 बावडिय़ां (कुण्ड) हैं। जो बहुत प्राचीन हैं। इनमें से 2-3 का तो लगभग अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। यहां अतिप्राचीन शीतला माता मंदिर और गांव के परकोटे के अवशेष भी हैं। यहां पौराणिक अवशेष तो बहुत हैं। खुदाई की जाए तो और भी बहुत कुछ मिल सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि कुंडी मैं खेतों के बीच वीरान में स्थित श्री कृष्ण की पटरानी रुक्मणी के शानदार मंडप के अवशेष आज भी मौजूद हैं। जो देखरेख के अभाव में इन दिनों अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सरकार भले ही आज पर्यटन के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। पुरासंपदा को बचाने के लिए प्रयास कर रही है। लेकिन जहां पर्यटन विकसित हो सकता हैं, उन जगहों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि सरकार पर्यटन को बढ़ावा देते हुए इस क्षेत्र के विकास पर ध्यान दें।