ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, महाराष्ट्र के मंत्री नीतीश राणे और उत्तर प्रदेश के मंत्री रविंद्र जायसवाल के हालिया बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
बरेली। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, महाराष्ट्र के मंत्री नीतीश राणे और उत्तर प्रदेश के मंत्री रविंद्र जायसवाल के हालिया बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मौलाना ने कहा कि मदरसों और उनसे जुड़े उलेमा का देश की आजादी में बड़ा योगदान रहा है, ऐसे में उन्हें कटघरे में खड़ा करना इतिहास से नाइंसाफी है।
मौलाना रजवी ने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ चले आंदोलनों में मदरसों से जुड़े उलेमा और छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने दावा किया कि भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर अन्य स्वतंत्रता आंदोलनों में धार्मिक शिक्षण संस्थानों से जुड़े लोगों ने अहम भूमिका निभाई। उनका कहना है कि दिल्ली की जामा मस्जिद से अंग्रेजों के खिलाफ जारी फतवों ने आंदोलन में जोश भरा। इंकलाब जिंदाबाद के नारों के साथ आजादी की जंग में रूह फूंकने वालों को आज गलत नजर से देखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
मौलाना ने कहा कि आज जिन मदरसों को बंद करने और आतंकवाद से जोड़ने की बातें की जा रही हैं, वे कभी राष्ट्र निर्माण की बुनियाद रहे हैं। अगर मदरसे न होते तो देश को आजादी मिलने में और ज्यादा समय लग सकता था। उन्होंने इसे अफसोसनाक बताया कि एक पूरे समुदाय को शक की निगाह से देखा जा रहा है। मौलाना ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संतुलित और न्यायपूर्ण बयान देने चाहिए। समाज को तोड़ने या किसी खास वर्ग को निशाना बनाने वाले बयान देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हर कोई किसी न किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करेगा तो इससे अराजकता का माहौल बन सकता है।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि आतंकवाद को किसी एक धर्म या समुदाय से जोड़ना गलत है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या करने वाले मुसलमान नहीं थे, फिर पूरे समुदाय पर आरोप लगाना कैसे उचित है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद एक बीमारी है, जिससे निपटने के लिए सभी धर्मों और समुदायों को मिलकर संघर्ष करना होगा। मौलाना ने संबंधित मंत्रियों से इतिहास का गंभीर अध्ययन करने की नसीहत दी। उनका कहना है कि मदरसों और उलेमा की ऐतिहासिक भूमिका को समझे बिना दिए जा रहे बयान समाज में गलत संदेश दे रहे हैं।