कैंट बोर्ड में रविवार को ऐसा संवाद हुआ जिसने शहर के अतीत पर जमी धूल को झाड़ दिया। बरेली को जानो मिट्टी की कहानियाँ विषय पर हुए इस आयोजन ने साफ कर दिया कि बरेली केवल आज का शहर नहीं, बल्कि वैदिक कालीन पांचाल की जीवित पहचान है। संवाद ने सीधे सवाल उठाया क्या बरेली अपने गौरवशाली इतिहास को भूलता जा रहा है।
बरेली। कैंट बोर्ड में रविवार को ऐसा संवाद हुआ जिसने शहर के अतीत पर जमी धूल को झाड़ दिया। बरेली को जानो मिट्टी की कहानियाँ विषय पर हुए इस आयोजन ने साफ कर दिया कि बरेली केवल आज का शहर नहीं, बल्कि वैदिक कालीन पांचाल की जीवित पहचान है। संवाद ने सीधे सवाल उठाया क्या बरेली अपने गौरवशाली इतिहास को भूलता जा रहा है।
कार्यक्रम की मेजबानी कैंट बोर्ड की सीईओ डॉ. तनु जैन ने की। सेना, प्रशासन, नगर निगम, शिक्षा जगत और सांस्कृतिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियाँ एक मंच पर जुटीं। ब्रिगेडियर गगनदीप, ब्रिगेडियर हरजीत सिंह, महापौर उमेश गौतम, चेयरमैन केशव अग्रवाल, रोहिलखंड विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक और पर्यटन विशेषज्ञों ने दो टूक शब्दों में अपनी बात रखी।
वक्ताओं ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि बरेली को एक साधारण नगर समझना ऐतिहासिक भूल है। यह वही धरती है जो वैदिक काल में पांचाल राज्य का केंद्र रही। महाभारत, वेद और पुराणों में वर्णित पांचाल की बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपरा आज भी बरेली की रगों में बह रही है।
संवाद में इस बात पर गहरी नाराजगी जताई गई कि इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद बरेली ने खुद को पहचानने में लापरवाही बरती है। वक्ताओं ने कहा कि अपने इतिहास को नजरअंदाज करना भविष्य से विश्वासघात है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो यह विरासत केवल किताबों तक सिमट कर रह जाएगी। चर्चा में जोर देकर कहा गया कि बरेली की ऐतिहासिक धरोहर हेरिटेज पर्यटन, शोध और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अपार संभावनाएँ रखती है। प्रशासन, सेना, शिक्षा जगत और समाज यदि एकजुट हों तो बरेली को सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
सीईओ डॉ. तनु जैन ने साफ शब्दों में कहा कि बरेली की पहचान सिर्फ वर्तमान विकास से नहीं बनेगी। उसकी असली पहचान उसकी मिट्टी में दबी कहानियों से है। इन कहानियों को सहेजना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना अब विकल्प नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का समापन सामान्य औपचारिकता नहीं, बल्कि एक चेतावनी के साथ हुआ। सभी ने संकल्प लिया कि ऐसे संवाद अब रस्म अदायगी नहीं रहेंगे, बल्कि बरेली की सोई हुई ऐतिहासिक चेतना को जगाने का आंदोलन बनेंगे।