
गडरारोड (बाड़मेर): अकाल और कम बारिश में भी पैदा होने वाली सेवण घास गोवंश के लिए वरदान साबित होती है। इन दिनों अच्छी बारिश के बाद राष्ट्रीय मरु उद्यान क्षेत्र के गांवों में सेवण घास बहुतायत में पैदा होने की संभावना है। ऐसे में किसानों की पशुधन को लेकर चिंता मिट सकती है।
देश की पश्चिमी सीमा के बड़े मरुस्थलीय क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उगने वाली और बहुउपयोगी सेवण घास का उपयोग कई वर्षों से पशु आहार के रूप में सर्वोत्तम माना जाता रहा है। किसान सेवण घास का भंडारण (कलार) बनाकर रखते हैं, जिससे यह 2-3 वर्षों तक खराब नहीं होती। अकाल की परिस्थितियों में पशुधन बचाने का यही एकमात्र उपाय है।
सेवण घास को बचाने के लिए कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, वन विभाग तथा राज्य और केंद्र सरकार कोई ठोस योजना बनाकर पहल करे और हजारों बीघा ओरण-गोचर भूमि में सेवण घास उगाएं तो पशुधन के लिए बेहतर चारे की व्यवस्था हो सकती है।
सीमावर्ती कई गांवों में सेवण घास विलुप्त होने की कगार पर है। इसका मुख्य कारण सिंचित क्षेत्र बनने के बाद ट्रैक्टर व जेसीबी मशीनों से खेतों की सफाई, ट्रैक्टरों से जुताई है। इसके अलावा ओरण-गोचर भूमि पर किए जा रहे अतिक्रमण हैं। इसके कारण क्षेत्र में सेवण घास के पनपने का स्थान ही नहीं बच पा रहा है।
हमारा सीमावर्ती क्षेत्र सेवण घास के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां सेवण बहुत मात्रा में होती है। लेकिन जेसीबी से सफाई और अतिक्रमण के चलते गोचर-ओरण भूमि समाप्त कर बुवाई करने से सेवण घास विलुप्त होती जा रही है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
-भारथाराम मेघवाल, सीमावर्ती किसान, गांव अकली
हम सभी हजारों मण सेवण घास की कलार बनाकर रखते हैं। लेकिन विगत कुछ वर्षों में अच्छे भाव मिलने और आर्थिक तंगी के कारण लोग इसे बेच देते हैं। अब तो सेवण घास विलुप्त होती जा रही है। खेतों में ट्रैक्टर चलाने के कारण यह पर्याप्त मात्रा में उगती ही नहीं है। सरकार को इसे संरक्षण देना चाहिए।
-गैन सिंह सोढ़ा, किसान, गड़स-बिजावल