
राजस्थान के बाड़मेर जिले में औद्योगिक विकास और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बीच जारी टकराव ने अब एक बेहद गंभीर मोड़ ले लिया है। गिरल माइंस के बाहर अपनी मांगों को लेकर पिछले लंबे समय से धरने पर बैठे स्थानीय श्रमिक जैसाराम मेघवाल की अचानक मृत्यु हो गई है। बताया जा रहा है कि धरने के दौरान जैसाराम की तबियत एकाएक खराब हो गई, जिसके बाद उन्हें तुरंत बाड़मेर जिला अस्पताल ले जाया गया। हालांकि, अस्पताल पहुंचने पर वहां तैनात डॉक्टरों की टीम ने स्वास्थ्य की बारीकी से जांच करने के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों और श्रमिकों में भारी आक्रोश फैल गया। घटना की गंभीरता को देखते हुए शिव विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी तुरंत अपने तमाम समर्थकों के साथ बाड़मेर जिला अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे। भाटी ने वहां पहुंचकर पीड़ित परिजनों से मुलाकात की, उन्हें ढांढस बंधाया और इस दुखद घटना के लिए स्थानीय प्रशासन और माइंस प्रबंधन के अड़ियल व उदासीन रवैये को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया।
श्रमिक जैसाराम मेघवाल के असामयिक निधन से आहत और आक्रोशित विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने बाड़मेर जिला अस्पताल की मोर्चरी से ही इस पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम को लेकर राज्य सरकार, स्थानीय जिला प्रशासन और गिरल माइंस के जिम्मेदार अधिकारियों पर तीखा हमला बोला। भाटी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर एक विस्तृत और बेहद तीखी प्रतिक्रिया पोस्ट की, जिसने मरुधरा के सियासी गलियारों में एक बार फिर नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने गंभीर शब्दों में लिखा- “आज प्रशासन के पूरी तरह से तानाशाही और संवेदनहीन रवैये के कारण एक गरीब और बेकसूर मजदूर हमारे इस सरकारी सिस्टम की भेंट चढ़ गया।”
भाटी ने यह स्पष्ट किया कि जब तक पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा, आश्रित को सरकारी नौकरी और माइंस में स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर कोई ठोस लिखित समझौता नहीं हो जाता, तब तक आंदोलनकारी पीछे नहीं हटेंगे।
सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने स्वर्गीय जैसाराम मेघवाल के त्याग और देश के विकास में उनके परिवार के योगदान को भी प्रमुखता से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस तरह देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए इन स्थानीय गरीब परिवारों ने अपनी उपजाऊ और पुश्तैनी जमीनें बेहद मामूली शर्तों पर सरकारों के हवाले कर दी थीं, लेकिन बदले में उन्हें केवल उपेक्षा और मानसिक प्रताड़ना ही नसीब हुई।
भाटी ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा- “स्वर्गीय श्री जैसाराम जी मेघवाल वे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी कीमती जमीनें देश और प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए सरकारों को सहर्ष सौंप दी थीं ताकि हमारा देश विकसित हो सके। लेकिन विडंबना देखिए कि वही जैसाराम अपनी बेहद वाजिब और बुनियादी मांगों को लेकर पिछले 2 महीने से इस भीषण गर्मी और धूल भरे माहौल में गिरल माइंस ऑफिस के बाहर लगातार धरने पर बैठे थे। स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में तब भी सो रहे थे और आज जब एक मासूम की जान चली गई है, तब भी वे चैन की नींद सो रहे हैं।”
आंदोलन स्थल पर लगातार 60 दिनों से जारी उपेक्षा के बाद हुई इस मौत ने स्थानीय प्रशासन के संवाद तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। विधायक भाटी ने अपनी पोस्ट के अंतिम हिस्से में सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की अंतरात्मा को झकझोरने वाले सीधे और बेहद कड़े सवाल दागे हैं।
भाटी ने व्यवस्था पर सीधा सवाल उठाते हुए पूछा- “आखिर इस बहरे और गूंगे सिस्टम को जगाने के लिए और कितने गरीब मजदूरों की जानें लेना बाकी रह गई है? क्या इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गरीब को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने और हक मांगने का भी अधिकार नहीं है?”